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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 639 में से

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पृष्ठ 426

निदानस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
अथातो ज्वरनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे ज्वरनिदान का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् आत्रेय
ने कहा था२ ॥ १-२ ॥
इह खलु हेतुर्निमित्तमायतनं कर्ता कारणं प्रत्ययः समुत्थानं निदान-
मित्यनर्थान्तरम् । तत्तिविधं-असात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञापराधः
परिणामश्चेति ॥ ३ ॥
निदान के पर्य्याय—इस निदान स्थान में हेतु, निमित्त, आयतन, कर्त्ता
कारण, प्रत्यय, समुत्थान ये निदान शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं । निदान
अर्थात् रोगों की उत्पत्ति का कारण तीन प्रकार का है, १. असात्म्येन्द्रियार्थ-
संयोग, २. प्रज्ञापराध ( बुद्धि का दोष ) और ३. परिणाम ( काल ) ॥ ३ ॥
अतस्त्रिविधिविकल्पा व्याधयः प्रादुर्भवन्त्याग्नेय-सौम्य-वायव्याः ।
द्विविधाश्चापरे राजसास्तामसाश्च । तत्र व्याधिरामयो गद आतङ्को
यक्ष्मा ज्वरो विकारो रोग इत्यनर्थान्तरम् ॥ ४ ॥
इसलिये रोग भी तीन प्रकार के ही होते हैं । १. आग्नेय ( पित्तजन्य )
२. सौम्य ( कफजन्य ), और ३. वायव्य ( वायुजन्य ) । ये शारीरिक रोग के
१. जिससे रोग जाना जाय उसका नाम 'निदान' है ।
'निश्चित्य दीयते प्रतिपाद्यते व्याधिरनेनेति निदानम्' ॥ जेज्जट ॥
२. संक्षेप में लिंग को निर्देश करने वाला सूत्रस्थान कहने के पश्चात् हेतु
और लिंग को बतलाने वाला 'निदानस्थान' कहते हैं । क्योंकि हेतु और लिंग
को जानकर की हुई चिकित्सा फलवती होती है । हेतु सन्निकृष्ट, विप्रकृष्ट,
व्यभिचार और प्रधान भेद से चार प्रकार का है । विस्तार के लिये
मधुकोष देखिये ।