चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ें१९१
आसन मारि बैठ तिह आमी । अब मों पहँ कित चाँदा जामी ॥३
सिंगी पूर नाद तस किया । जन बैसन्दर परा विष दिया ॥४
सुनतहि चाँद बेधि तस गई । अपछठ मरन सनेही मई ॥५
जस अहेरिया पा बिरख, भिरिग बेधि लै जाइ ।६
टूटैटा भयतें अहेरिया, चाँदहि गोइन लाइ ॥७
टिप्पणी—(१) सौंहै—(इस वस्तुके) भ्रमके निमित्त ।
(२) कबिड—छवि । कँडकहूँ—बहाना बनाकर । पइँ—पाछ ।
३७४
( मनेर १७७ख )
चीजी कपसून इंसान कि चाँदा दीवान शुद
( उसका जादू करना चाँदका पागल हो जाना )
सिंगी पूर मन्त्र सो लाषा । चाँद सुन कछु चेत न आषा ॥१
चाँदा गोइन लइ चला भुलाई । गाठ गीत औ कछु न फराई ॥२
तइस संग भइ चाँद सुभागी । गाँव गाँव फिरि गोहन लागी ॥३
देखि सिंघ औ कण्ठ अधारी । भूली कछु न सँभारी घारी ॥४
चाँदहि बिसरा सब सर्वंसारू । बिसरा लोर जैं जीठ अधारू ॥५
सुनै नाद अउ देख, पाछे हेरि न बारि ।६
लोर आइओ देखी मढ़ी, चाँदा बिनु अँधियारि ॥७
३७५
( मनेर १७५क )
यूँ लोरक आमद व बीनदके चाँदा दर बुतखाना नीस्त
( लोरकने लौटकर देखा कि चाँद मन्दिरमें नहीं है )
सुनि मढ़ी देखि लोरक राषा । काहे कहूँ बिधि कीन्हि बिखोषा ॥१
अबहूँ जा र सरग चड़ धावउँ । तो वहँ खोज चाँद कर पावउँ ॥२
लार चहु दिसि भँमि भँमि आवा । खाय चाँद कर राव न पावा ॥३
रैन गइ पै चाँद न पाइ । उठा सुरुज चलि खोज फराइ ॥४