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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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पृष्ठ 169

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(रीडिङ्ग्स ७५; काची)
नाठम्मोद शुख्ने राब अज शुखने रसूलान व बाज गदानीदने ईशान रा
(दूतोंकी बात सुनकर रावका बिराध होना और उन्हें लौटाना)
बात सजोग बसिठ जो कहा । नाइ मूँड सुन राजा रहा ॥१
बसिठ बचन बिस भरे सुनाये¹ । रावै ठग गै ठाहू खाये² ॥२
गा असरो मनहुत जो सँजोवा । भा निरास चित भीतर रोवा ॥३
सरग चाँद मैं³ पाई नाहीं । बसिठों⁴ उत्तर देउँ उठ बाहीं ॥४
आज साँझ जो चाँद न पाऊँ । पहर रात तुम्ह सरग पठाऊँ ॥५
जीउ दान जो चाहु, पठउँ⁵ चाँद दिवाइ ।६
नतउ धर उवत गढ़ तोरों, कहु⁶ महर सों⁷ जाइ ॥७
पाठान्तर—काची प्रति :
शीर्षक—जवाब दादने राव रूपचन्द रसूलान रा (दूतोंको राव रूपचन्द
का उत्तर)
१—सुनावा २—रावै गै ठग ठाहू खाया ३—महुं; ४—बसिठसों;
५—पठवहु; ६—कहहु ७—सो ।
टिप्पणी—(१) नाइ—झुका कर । मूँड—शिर ।
(३) गा—गया । असरा—आसरा आशा ।
(७) नतउ—नही तो ।
११०
(रीडिङ्ग्स ७६)
बाज़ आमदने रसूलान बर महर व हाय नमूदने कर्ने राव रूपचन्द
(दूतोंका वापस आकर राव रूपचन्दकी माँग कहना)
बसिठ बहुरि गावर महँ आये । महर देखि जिन आगैं धाये ॥१
पूछा महर कुमर सों आयहु । का कहु कम उत्तर पायहु ॥२
अस पूछ वस बसिटीं कहा । सुनै नहिं राजा कोह कै रहा ॥३
हस्ति पाइ धन दरब न मानै । चाँद माँगि बिन घर न जानै ॥४
जो जिउ चाँदा पीछहि दीन्हाँ । सो तू राउ चाहु जिउ छीन्हा ॥५