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चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

✽ श्री गणेशाय नमः ✽

चाणक्य नीति

✽ दर्पण ✽

भाषा टीका सहित ।


साहित्य-शास्त्र्युपाधिधारिणा:-
पं० रामतेज पांण्डेयेन संस्कृतः
तथा
पं० रामबिहारी मिश्रेण च संशोधिता ।

✽ प्रकाशक ✽
ठाकुरप्रसाद एण्ड सन्स बुकसेलर,
राजादरवाजा, वाराणसी !

फोन ६४६५०      ●      मूल्य १) रुपया

নীতি প্রকাশ


শ্রী ... ...

... কর্তৃক প্রণীত ...

...

কলিকাতা ...

* श्रीः *

चाणक्य-नीति-दर्पणः

भाषाटीका-सहितः


साहित्य-शास्त्र्युपाधिधारिणा—
पं० रामतेजपाण्डेयेन च संस्कृतः

तथा
पं० रामविहारी मिश्रेण संशोधितः


प्रकाशक—
ठाकुरप्रसाद एण्ड सन्स बुकसेलर
राजादरवाजा, वाराणसी।

सन् १९८२ ] \hfill

CC-0. Swami Atmanand Giri (Prabhuji) . Veda Nidhi Varanasi. Digitized by eGangotri

* श्रीगणेशाय नमः *

चाणक्यनीतिदर्पणः

प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् ।
नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम् ॥१॥

दोहा—सुमति बढ़ावन सबहि जन, पावन नीति प्रकास ।
टीका चाणकनीति कर, भनत भवानीदास ॥ १ ॥

मैं उन विष्णु भगवान्‌को प्रणाम करके कि जो तीनों लोकों के स्वामी हैं, अनेक शास्त्रों से उद्धृत राजनीति-समुच्चय विषयक बातें कहूँगा ॥ १ ॥

अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः ।
धर्मोपदेशं विख्यातं कार्याऽकार्य शुभाऽशुभम् ॥२॥

दोहा—तत्व सहित पढ़ि शास्त्र यह, नर जानत सब बात ।
काज अकाज शुभाशुभहिं, मरम नीति विख्यात ॥२॥

इस नीति के विषय को शास्त्र के अनुसार अध्ययन करके सज्जन धर्मशास्त्र में कहे शुभाशुभ कार्यको जान लेते हैं ॥२॥

तदहं संप्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ।
येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते ॥३॥

४
चाणक्यनीतिदर्पणः

दोहा—मैं सोइ अब बरनन करूँ, अति हितकारक अङ्ग ।
जाके जानत होहिं जन, सबही विधि सर्वज्ञ ॥ ३ ॥

लोगों की भलाई के लिए मैं वह बात बताऊँगा कि जिसे समझ लेने से मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है ॥ ३ ॥

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टास्त्रीभरणेन च ।
दुःखिते सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ॥ ४ ॥

दोहा--उपदेशत शिपमूढ़ कहँ, व्यभिचारिणि ढिग वास ।
अरि को करत विश्वास उर, विदुषहु लहत विनास ॥४॥

मूर्खशिष्य को उपदेश देनेसे, कर्कशा स्त्री का भरण-पोषण करने से और दुखियों का सम्पर्क रखने से समझदार मनुष्य को भी दुःखी होना पड़ता है ॥ ४ ॥

दुष्टाभार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।
ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥ ५ ॥

दोहा—भामिनि दुष्टा मित्र शठ, प्रति उत्तरदा भृत्य ।
अहि युत बसत अगार में, सब विधि मरिबो सत्य ॥५॥

जिस मनुष्य की स्त्री दुष्टा है, नौकर उत्तर देनेवाला (मुँह लगा) है और जिस घर में साँप रहता है उस घरमें जो रह रहा है तो निश्चय है कि किसी न किसी रोज उसकी मौत होगी ही ॥५॥

आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान् रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ ६ ॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ५

दोहा—धन गहि राखहु विपति हित, धनं ते वनिता धीर ।
तजि वनिता धनकूँ तुरत, सबते राख शरीर ॥ ६ ॥
आपत्तिकाल के लिए धनको और धन से भी बढ़कर स्त्री की रक्षा करनी चाहिये । किन्तु स्त्री और धन से भी बढ़कर अपनी रक्षा करनी उचित है ॥ ६ ॥

आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमंतश्च किमापदः ।
काचिच्चलिता लक्ष्मीः संचितोऽपिविनश्यति ॥ ७ ॥
दोहा—आपद् हित धन रखिये, धनिहिं आपदा कौन ।
संचितहूं नशि जात है, जो लक्ष्मी करु गौन ॥ ७ ॥
आपत्ति से बचने के लिए धन की रक्षा करनी चाहिये । इस पर यह प्रश्न होता है कि श्रीमान् के पास आपत्ति आयेगी ही क्यों ? उत्तर देते हैं कि कोई ऐसा समय भी आ जाता है, जब लक्ष्मी रानी भी चल देती हैं । फिर प्रश्न होता है कि लक्ष्मी के चले जानेपर जो कुछ बचा बचाया धन है, वह भी चला जायगा ही ॥ ७ ॥

यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवः ।
न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत् ॥ ८ ॥
दोहा—जहाँ न आदर जीविका, नहिं प्रिय बन्धु निवास ।
नहिं विद्या जिस देश में, करहु न दिन इक वास ॥ ८ ॥
जिस देश में न सम्मान हो, न रोजी हो, न कोई भाई-बन्धु हो और न विद्या का ही आगम हो, वहाँ निवास नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥

६ चाणक्यनीतिदर्पण।

धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः ।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत् ॥६॥
दोहा—धनिक वेदप्रिय भूप अरु, नदी वैद्य पुनि सोय ।
बसहु नाहिं इक दिवस तहँ, जहँ यह पञ्च न होय ॥९॥
धनी (महाजन) वेदपाठी ब्राह्मण, राजा, नदी और पाँचवें वैद्य, ये पाँच जहाँ न हों, वहाँ एक दिन भी न बसो ॥ ९ ॥

लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता ।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र सङ्गतिम् ॥१०॥
दोहा—दानदक्षता लाज भय, यात्रा लोक न जान ।
पाँच नहीं जहँ देखिये, तहाँ न बसहु सुजान ॥ १० ॥
जिसमें रोजी, भय, लज्जा, उदारता और त्यागशीलता, ये पाँच गुण विद्यमान नहीं, ऐसे मनुष्य से मित्रता नहीं करनी चाहिये ॥ १० ॥

जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे ।
मित्रं चापत्तिकोले तु भार्यां च विभवक्षये ॥११॥
दोहा—काज भृत्य कूँ जानिये, बन्धु परम दुख होय ।
मित्र परखियतु विपति में विभव विनाशित जोय ॥११॥
सेवा कार्य उपस्थित होने पर सेवकों की, आपत्तिकाल में मित्र की, दुःख में, बान्धवों की और धन के नष्ट हो जाने पर स्त्री की परीक्षा की जाती है ॥ ११ ॥

चाणक्यनीतिदर्पणः

आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे ।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥१२॥
दोहा—दुख आतुर दुरभिक्ष में, अरि जय कलह अभङ्ग ।
भूपति भवन मसान में, बन्धु सोई रहे सङ्ग ॥१२॥
जो बीमारी में, दुख में, दुर्भिक्ष में, शत्रु द्वारा किसी प्रकार का सङ्कट उपस्थित होनेपर, राजद्वार में और श्मशान पर जो ठीक समय पर पहुँचता है, वही बान्धव कहलाने का अधिकारी है॥१२॥

यो ध्रुवाणि परित्यज्य ह्यध्रुवं परिषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेवहि ॥१३॥
दोहा—ध्रुव कूँ तजि अध्रुव गहै, चित्तमैं अति सुख चाहि ।
ध्रुव तिनके नाशत तुरत, अध्रुव नष्ट ह्वै जाहि ॥१३॥
जो मनुष्य निश्चित वस्तु को छोड़कर अनिश्चित की ओर दौड़ता है तो उसकी निश्चित वस्तु भी नष्ट हो जाती है और अनिश्चित तो मनो पहले ही नष्ट थी ॥१३॥

वरयेत्कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम् ।
रूपशीलां न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ॥१४॥
दोहा—कुल जातीय विरूप दोउ, चतुर वर करि चाह ।
रूपवती तउ नीच तजि, समकुल करिय विवाह ॥१४॥
समझदार मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह कुरुपा भी कुलवती कन्या के साथ विवाह कर ले, पर नीच सुरूपवती के साथ न करे ।

८
चाणक्यनीतिदर्पणः

क्योंकि विवाह अपने समान कुल में ही अच्छा होता है ॥१४॥

नदीनां शस्त्रपाणीनां नखीनां शृङ्गिणां तथा ।
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषुराजकुलेषु च ॥१५॥

दोहा—सरिता शृङ्गी शस्त्र अरु, जिव जितने नखवन्त ।
तियको नृपकुलको तथा, करहिं विश्वास न सन्त ॥१५॥

नदियों का, शस्त्रधारियों का, बड़े-बड़े नखवाले जन्तुओं का, सींगवालों का, स्त्रियों का और राजकुल के लोगों का विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥

विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि काञ्चनम् ।
नीचादप्युत्तमां विद्यां स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥१६॥

दोहा—गहु सुधा विषते कनक, मलते बहुकरि यत्न ।
नी... विद्या विमल, दुष्कुलते तियरत्न ॥१६॥

विष से भी अमृत, अपवित्र स्थान से भी कञ्चन, नीच मनुष्य से भी उत्तम विद्या और दुष्कुल से भी स्त्रीरत्न को ले लेना चाहिए ॥ १६ ॥

स्त्रीणां द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा ।
साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥१७॥

दोहा—तिय अहार देखिय द्विगुण, लाज चतुरगुन जान ।
षटगुन तेहि व्यवसाय तिय, काम अष्टगुन मान ॥१७॥

स्त्रियों में पुरुषकी अपेक्षा दूना आहार चौगुनी लज्जा छगुना