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चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 132 में से

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पृष्ठ 8

६ चाणक्यनीतिदर्पण।

धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः ।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत् ॥६॥
दोहा—धनिक वेदप्रिय भूप अरु, नदी वैद्य पुनि सोय ।
बसहु नाहिं इक दिवस तहँ, जहँ यह पञ्च न होय ॥९॥
धनी (महाजन) वेदपाठी ब्राह्मण, राजा, नदी और पाँचवें वैद्य, ये पाँच जहाँ न हों, वहाँ एक दिन भी न बसो ॥ ९ ॥

लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता ।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र सङ्गतिम् ॥१०॥
दोहा—दानदक्षता लाज भय, यात्रा लोक न जान ।
पाँच नहीं जहँ देखिये, तहाँ न बसहु सुजान ॥ १० ॥
जिसमें रोजी, भय, लज्जा, उदारता और त्यागशीलता, ये पाँच गुण विद्यमान नहीं, ऐसे मनुष्य से मित्रता नहीं करनी चाहिये ॥ १० ॥

जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे ।
मित्रं चापत्तिकोले तु भार्यां च विभवक्षये ॥११॥
दोहा—काज भृत्य कूँ जानिये, बन्धु परम दुख होय ।
मित्र परखियतु विपति में विभव विनाशित जोय ॥११॥
सेवा कार्य उपस्थित होने पर सेवकों की, आपत्तिकाल में मित्र की, दुःख में, बान्धवों की और धन के नष्ट हो जाने पर स्त्री की परीक्षा की जाती है ॥ ११ ॥