बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ें14 अनित्य जीवन से अपने मन को मुक्त करो और संसार में विविध योनियों को देखते हुए,
भावना-द्वारा अपने चित्त को वितर्क-रहित शान्ति-परायण और राग-मुक्त (= विराग, विरज)
करो। तब ‘अनिमित्त' का अभ्यास करो।” ⁷¹
15 तब महर्षि का धर्म सुनकर उसने धर्माचरण का प्रथम फल पाया; और इसकी प्राप्ति होने से
दुःखरूपी महासागर में से केवल एक बूँद उसके लिए रह गई।
16 गृहस्थ होते हुए भी उसने ज्ञान द्वारा श्रेय और तत्त्व (वास्तविक सत्य) का अनुभव किया जो
अज्ञानी के लिए (सुलभ) नहीं है, चाहे वह तपोवन में हो या स्वर्ग में, चाहे वह तृष्णा-रहित
मनुष्यों के झुण्ड (= वितृष्ण वन) में रहता हो या अरूप लोक के शिखर पर।
17 विविध मिथ्या दृष्टियों के जाल से तथा संसार के दुःखों से मुक्त नहीं होने के कारण वे
अतत्त्वदर्शी नष्ट होते हैं और केवल रागरहित होनेवाले ही विशेष पद पर पहुँचते हैं।
18 अपने में सम्यक् दृष्टि उत्पन्न होनेपर उसने कुदृष्टियों का वैसे ही त्याग किया जैसे शरद् ऋतु
का मेघ पत्थरों की झड़ी लगावे और ईश्वर आदि मिथ्या कारणों से संसार उत्पन्न होता है या
यह (संसार) कारण-रहित है, ऐसा उसने नहीं माना। ⁷²
*19 क्योंकि यदि (परिणाम से) कारण भिन्न प्रकार का है, तब उत्पत्ति (= उपपत्ति) नहीं हो
सकती; और कारण नहीं है, (ऐसा मानना) भारी भूल है। इन बातों को विद्या (= श्रुत) एवं
ज्ञान द्वारा क्रमशः जानकर वह तत्त्व का दर्शन करने में अवश्य ही संशय-रहित था।
20 यदि ईश्वर संसार को पैदा करता तो, इसमें व्यवस्थित कार्य पद्धति नहीं होती और लोग भव-
चक्र में नहीं भटकते; जिस किसी योनि में जो जन्म लेता वह वहीं रहता।
21 देहधारी प्राणियों को अपनी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं होता और न उसके लिए इच्छित वस्तु
की ही उत्पत्ति होती है। जो कुछ भला-बुरा (= शुभाशुभ ?) देह-धारियों को होता वह ईश्वर
होने के कारण ईश्वर में (भी) होता।
22 लोगों को ईश्वर के प्रति कुछ सन्देह नहीं होता और वे उसके प्रति पिता की तरह स्नेह अनुभव
करते। अपने ऊपर विपत्ति आनेपर वे उसे बुरी बातें नहीं कहते, और संसार भाँति-भाँति के
देवताओं की पूजा नहीं करता।
23 यदि उसकी सृष्टि में कोई सङ्कल्प (अभिप्राय) है, तो वह आज यहाँ ईश्वर नहीं; क्योंकि (तब)
यह (सृष्टि) सङ्कल्प का परिणाम होता (ईश्वर का नहीं)। यदि सङ्कल्प की निरन्तर कार्यशीलता
मानी जाय, तो वही (सङ्कल्प) ईश्वर होने का कारण होगा।
24 या यदि यह सृष्टि किसी सङ्कल्प से प्रवृत्त नहीं होती है, तो उस (ईश्वर) के काम बच्चे के-से
कारण-रहित हैं और यदि ईश्वर को अपने पर अधिकार नहीं, तो उसे संसार पैदा करने की ही
क्या शक्ति?
25 यदि वह स्वेच्छानुसार लोगों से दुःख-सुख अनुभव कराता है, तब किसी वस्तु में आसक्ति या
उससे विमुखता उस (ईश्वर) को होती है और इसलिए अधिकार उसमें नहीं (बल्कि वस्तु में)
रहता है।
26 लोग विवश होकर उसके अधीन होते और कार्यों का उत्तरदायित्व उसी पर होता। देहधारी के
द्वारा कुछ भी नहीं किया जाता और कर्म-फल होता ही नहीं। कार्य के साथ सम्पर्क
(= कर्मयोग) उस (ईश्वर) पर निर्भर करता।
27 यदि अपने कार्यों के कारण वह ईश्वर है, तब (क्योंकि उसके कार्यों में लोगों का भी भाग है,
इसलिए) वह ईश्वर नहीं हो सकता। या यदि वह सर्वव्यापी (= विभु) एवं कारण-रहित है, तब
समस्त जगत का ईश्वरत्व स्थापित होता।
28 या यदि ईश्वर के कार्य के अतिरिक्त कोई दूसरा कार्य है, तब इसी कारण उसके अतिरिक्त कोई
दूसरा शक्तिशाली ईश्वर होगा। और यह निश्चित (= व्यवस्थित) नहीं कि उसके अतिरिक्त कोई
दूसरा (ईश्वर) है; इसलिए जगत का कोई ईश्वर नहीं।
29 ईश्वर का स्रष्टा मानने से उठनेवाली परस्पर-विरोधी बातों को उसने देखा और स्वभाव के
सिद्धान्त में भी वे ही दोष वर्तमान हैं।
30 स्वभाव-वाद, इंद्रप्रत्ययता (कार्य-कारण)-वादी के सिद्धान्तों (= आश्रय) को कुछ हद तक
अस्वीकार करता है और कार्य के सम्बन्ध में कारण की कुछ शक्ति नहीं मानता है; किन्तु देखा
जाता है कि बीज आदि विविध द्रव्यों से परिणाम (फल) पैदा होते हैं, इसलिए स्वभाव कारण
नहीं है।
31 एक कर्ता विविध वस्तुओं का कारण नहीं हो सकता; इसलिए एकात्मक कहा जानेवाला
स्वभाव सांसारिक प्रवृत्ति का कारण नहीं।
32 स्वभाव सर्वव्यापी है, ऐसा प्रतिपादित किया जाता है, इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि यह
कोई परिणाम पैदा नहीं कर सकता; और ..... इसलिए स्वभाव उत्पत्ति का कारण नहीं।
33 क्योंकि यह सर्वव्यापी है, इसलिए कारण होने के कारण इसे सब चीजों का निरन्तर सार्वभौम
कारण होना चाहिए; किन्तु फल के सम्बन्ध में (कारण के) व्यापार में हम एक सीमा देखते हैं;
इसलिए स्वभाव उत्पत्ति का कारण नहीं।
34 यह स्थापित होता है कि यह निर्गुण है, इसलिए इसका फल निर्गुण होना चाहिए; किन्तु संसार
में सब चीजों को हम सगुण देखते हैं, इसलिए स्वभाव सांसारिक प्रवृत्ति का कारण नहीं।
⁷¹- अनिमित्त = निर्वाण - अभिधर्मकोष 8.44
⁷²- प्रवृत्तिदुःखस्य च तस्य लोके तृष्णादयो दोषगणा निमित्तं।
नैवेश्वरो न प्रकृतिर्न कालो नापि स्वभावो न विधिर्यदृच्छा ॥- सौन्दरनन्द, सोलह 17।
88 अश्वघोष