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सर्वकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 122 में से

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पृष्ठ 87

36 उसने पहचाना कि अरूप देवों की, जो मोहवश ध्यान को ही निर्वाण समझते हैं, अवस्था
अनित्य है; शान्त होकर उसने निमित्त शून्य चित्त प्राप्त किया और अरूप-भव की आसक्ति
छोड़ी।
37 उसने अनुभव किया कि महानदी (= सिन्धु) की बलवती धारा के समान बहते हुए चित्त की
चञ्चलता विघ्न का मूल है; वीर्य के सहारे आलस्य छोड़कर उसने शान्ति प्राप्त की और वह पूर्ण
(निर्मल ?) सरोवर के समान निश्चल हो गया।
38 उसने जीवन को असार अनात्म और नाशवान् (= व्ययधर्मा) देखा; किसी को छोटा-बड़ा या
बराबर नहीं देखते हुए उसने मिथ्याभिमान छोड़ा;..।
39 ज्ञानरूपी अग्नि से अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर कर, उसने नित्य और अनित्य को (एक दूसरे
से) भिन्न देखा और योग द्वारा अपनी विद्या को पूर्णकर, उसने अविद्या को अच्छी तरह काट
डाला।
40 दृष्टि एवं भावना से युक्त होकर, वह दश (संयोजनों, बन्धनों) से मुक्त हुआ और अपना कार्य
पूरा कर, वह शान्तिमय, हाथ जोड़े, बुद्ध को देखता खड़ा रहा।
41 अपने 3 शिष्यों के साथ-जो 3 विद्याओं के ज्ञाता (= त्रैविद्य) थे, जिन्होंने 3 (आस्रवों) को
क्षीणकर दिया था, और जिन्होंने 3 (शील समाधि प्रज्ञा) को भलीभाँति प्राप्तकर लिया था-
सुगत (तीसरे पर्व के) पूर्ण चन्द्रमा के समान शोभित हुए, जो 15वें मुहूर्त में 3 ताराओंवाले
उस (ज्येष्ठा) नक्षत्र से युक्त हो, जिसका अधिपति (= अधिदेव) अनुजदेव (इन्द्र) है।⁶⁸
॥बुद्धचरित महाकाव्य का “महाशिष्यों की प्रव्रज्या” नामक 17वाँ सर्ग समाप्त ॥
अठारहवाँ सर्ग
अनाथपिण्डद की दीक्षा
1 तब एक बार उत्तर की ओर से कोशल देश से एक धनी गृहपति आया। उसे गरीबों को धन
देने की आदत थी। उसका प्रसिद्ध नाम सुदत्त था।
2 उसने सुना “ऋषि यहीं रहते हैं” और यह सुनकर उसने उन्हें देखना चाहा और रात में उनके
समीप गया। उसने सुगत को प्रणाम किया। वह विशुद्धस्वभाव होकर आया है, यह जानकर
उन्होंने उसे उपदेश दिया:-
3 “हे मनीषी, धर्म की प्यास से नींद छोड़कर रात में तुम मेरा दर्शन करने आये हो, इसलिए
इस प्रकार आये हुए मनुष्य (= तथागत) के लिए नैष्ठिक-पद का प्रदीप ऊपर उठाया जाय।
4 (तुममें-) ये जो सद्गुण दिखाई पड़ते हैं इसका कारण है तुम्हारा (शुद्ध) आशय, तुम्हारा धैर्य,
मेरे विषय में सुनकर (उत्पन्न) हुई तुम्हारी श्रद्धा और पूर्व-निमित्त द्वारा (शुद्ध) हुई तुम्हारी चित्त-
वृत्ति।
5 जो उत्तम (वस्तु) है उसे दान करने से इस लोक में यश होता है और परलोक में फल, यह
जानकर तुम्हें धर्म से प्राप्त होनेवाला कोष उचित समय पर भक्तिपूर्ण चित्त से सम्मानपूर्वक दान
करना चाहिए।
6 शील ग्रहण कर अपना आचरण ठीक करो; क्योंकि शील का पालन एवं सम्मान करने से
अधम अधःलोकों का भय जाता रहता और मनुष्य को ऊपर के स्वर्गों की प्राप्ति अवश्य होती
है।
7 कामासक्तियों में होनेवाले अन्वेषण आदि के दुष्परिणामों को देखते हुए और त्याग-मार्ग के
सुपरिणामों का अनुभव करते हुए, विवेक से उत्पन्न होनेवाली सच्ची शान्ति में लगो।
8 मौत व बुढ़ापे की पीड़ा के रहते संसार भटक रहा है, यह ठीक-ठीक देखकर जन्म-मुक्त शान्ति
के लिए यत्न करो और जन्म के अधीन नही होने से वह (शान्ति) बुढ़ापे व मौत से (भी)
रहित है।⁶⁹
9 जैसे यह जानते हो कि अनित्यता के कारण लोगों को हरदम दुःख होता है, वैसे ही जानो के
देवताओं को (भी) वही दुःख है। प्रवृत्ति में कुछ भी नित्यता नही है।
10 जहाँ अनित्यता है वहाँ दुःख है; ..... । तब जो (धातु अर्थात् धातुओं से बना शरीर) अनित्य
दुःखमय एवं अनात्म है, उसमें 'मैं' या 'मेरा' कैसे हो सकता है? ⁷⁰
11 इसलिए इस दुःख को दुःख, इसकी उत्पत्ति (= समुदय) को उत्पत्ति, दुःख निरोध को निरोध
(= व्युपशम) और शुभ मार्ग को मार्ग समझो।
12 इस जगत् को दुःखमय एवं अनित्य जानो और मानव जाति को, कालरूपी आग से, जैसे
असली आग से, बिलकुल दग्ध देखकर, तुम अस्तित्व एवं विनाश को समान रूप से
अवांछनीय समझो।
13 इस जगत् को शून्य, 'मैं' या 'मेरा' से रहित, माया सदृश्य जानो और इस शरीर को संस्कारों
(उत्पादकों, वस्तुओं) का परिणाम-मात्र विचारते हुए, इसे केवल तत्त्वों (= धातुओं) का बना
हुआ समझो।

⁶⁸- काम-आस्रव, भव-आस्रव और अविद्या-आस्रव।
⁶⁹- जन्म-मुक्त शान्ति = वह शान्ति जिसकी प्राप्ति होनेपर फिर जन्म नही होता है। “न जायते शान्तिमवाप्य
भूयः”—सौन्दरनन्द, सोलह 5।
⁷⁰- धातु के लिए देखिये—सौन्दरनन्द, सोलह 47-48।
बुद्धचरित 87