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सर्वकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 122 में से

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पृष्ठ 58

सुन्दोपसुन्दावसुराँ यदर्थमन्योन्यवैरप्रसृतौ विनष्टौ ।
सौहार्दविश्लेषकरेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३२
जिनके लिए सुन्द और उपसुन्द नामक दो असुर, एक दूसरे के प्रति वैर बढ़नेपर, नष्ट हुए, मैत्री
विलगानवाले उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥३२॥
येषां कृते वारिणि पावके च क्रव्यात्सु चात्मानमिहोत्सृजन्ति ।
सपत्नभूतेष्वशिवेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३३
जिनके लिए जल में, अग्नि में, व हिंसक जीवों के आगे (लोग) अपने को उत्सर्ग (= समर्पित) कर देते हैं,
शत्रु-सदृश व अमङ्गलजनक उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥३३॥
कामार्थमज्ञः कृपणं करोति प्राप्नोति दुःखं वधबन्धनादि ।
कामार्थमाशाकृपणस्तपस्वी मृत्युं श्रमं चार्छति जीवलोके ॥११.३४
काम (= विषय) के लिए अज्ञानी क्षुद्रता करता है और वध-बन्धन आदि दुःख पाता है। तृष्णा से दीन
हुआ बेचारा प्राणि-जगत् काम के लिए मौत व थकावट पाता है ॥३४॥
गीतैर्हियन्ते हि मृगा वधाय रूपार्थमग्नौ शलभाः पतन्ति ।
मत्स्यो गिरत्यायसमामिषार्थी तस्मादनर्थं विषयाः फलन्ति ॥११.३५
गीतों से मृग वध के लिए अपहृत होते हैं; रूप के लिए पतङ्ग अग्नि में गिरते हैं; मांस चाहनेवाली मछली
लोहे की कँटिया निगलती है; इसलिए विषयों का फल विपत्ति है ॥३५॥
कामास्तु भोगा इति यन्मतिः स्याद्भोगो न केचित्परिगण्यमानाः ।
वस्त्रादयो द्रव्यगुणा हि लोके दुःखप्रतीकार इति प्रथायाः ॥११.३६
काम भोग हैं, ऐसा जो विचार है सो कोई भी काम भोग नही गिने जा सकते; क्योंकि वस्त्र आदि विषय
दुःख के प्रतीकार हैं, ऐसा समझना चाहिए ॥३६॥
इष्टं हि तर्षप्रशमाय तोयं क्षुन्नाशहेतोरशनं तथैव ।
वातातपाम्ब्वावरणाय वेश्म कौपीनशीतावरणाय वासः ॥११.३७
प्यास मिटाने के लिए पानी इष्ट (= चाहा जाता है) है, उसी प्रकार भूख मिटाने के लिए भोजन, हवा धूप
व पानी से बचने के लिए घर, शीत-निवारण और लङ्गोते के लिए वस्त्र ॥३७॥
निद्राविघाताय तथैव शय्या यानं तथाध्वश्रमनाशनाय ।
तथासनं स्थानविनोदनाय स्नानं मृजारोग्यबलाश्रयाय ॥११.३८
उसी प्रकार नींद (की बाधा) दूर करने के लिए शय्या, उसी तरह रास्ते की थकावट नष्ट करने के लिए
गाड़ी, उसी तरह खड़ा रहना दूर करने के लिए आसन और मार्जन आरोग्य व बल प्राप्त करने के लिए
स्नान (इष्ट है) ॥३८॥
दुःखप्रतीकारनिमित्तभूतास्तस्मात्प्रजानां विषया न भोगाः ।
अश्नामि भोगानिति कोऽभ्युपेयात्प्राज्ञः प्रतीकारविधौ प्रवृत्तः ॥११.३९
इसलिए दुःख-प्रतीकार के कारणस्वरूप विषय लोगों के लिए भोग नहीं हो सकते। (दुःख) प्रतिकार-विधि
में लगा हुआ कौन बुद्धिमान् यह मानेगा—"मैं भोग कर रहा हूँ" ॥३९॥
यः पित्तदाहेन विदह्यमानः शीतक्रियां भोग इति व्यवस्येत् ।
दुःखप्रतीकारविधौ प्रवृत्तः कामेषु कुर्यात्स हि भोगसञ्ज्ञाम् ॥११.४०
पित्तज्वर से जलता हुआ जो (आदमी) शीतोपचार को भोग समझेगा, दुःख-प्रतीकार-उपाय में लगा हुआ
वही (आदमी) कामों (= विषयों) को भोग समझेगा ॥४०॥
कामेष्वनैकान्तिकता च यस्मात्ततोऽपि मे तेषु न भोगसञ्ज्ञा ।
य एव भावा हि सुखं दिशन्ति त एव दुःखं पुनरावहन्ति ॥११.४१
क्योंकि कामों (विषयों) में ऐकान्तिकता (= एक अन्त) नही है, इसलिए भी मैं कामों को भोग नहीं
समझता। जो ही पदार्थ सुख देते हैं, वे ही फिर दुःख लाते हैं ॥४१॥
गुरूणि वासांस्यगुरुणि चैव सुखाय शीते ह्यसुखाय घर्मे ।
चन्द्रांशवश्चन्दनमेव चोष्णे सुखाय दुःखाय भवन्ति शीते ॥११.४२
क्योंकि, भारी वस्त्र और अगुरु से जाड़े में सुख होता है और गर्मी में असुख; चन्द्र किरणों व चन्दन से
गर्मी में सुख होता है और जाड़े में असुख ॥४२॥
द्वन्द्वानि सर्वस्य यतः प्रसक्तान्यलाभलाभप्रभृतीनि लोके ।
अतोऽपि नैकान्तसुखोऽस्ति कश्चिन्नैकान्तदुःखः पुरुषः पृथिव्याम् ॥११.४३
क्योंकि संसार मे हानि-लाभ आदि द्वन्द्व सबमें लगे हुए हैं, इसलिए भी पृथिवी पर कोई पुरुष न तो
एकान्त (= केवल) सुखी है और न एकान्त दुःखी है ॥४३॥
दृष्ट्वा च विमिश्रां सुखदुःखतां मे राज्यं च दास्यं च मतं समानम् ।
नित्यं हसत्येव हि नैव राजा न चापि सन्तप्यत एव दासः ॥११.४४
दुःख व सुख को मिला हुआ देखकर, राज्य व दासत्व को मैं समान मानता हूँ। न तो राजा ही नित्य
हँसता है और न दास ही नित्य संतप्त होता है ॥४४॥
आज्ञा नृपत्वेऽभ्यधिकेति यत्स्यान्महान्ति दुःखान्यत एव राज्ञः ।
आसङ्गकाष्ठप्रतिमो हि राजा लोकस्य हेतोः परिखेदमति ॥११.४५
यह कि राजत्व में आज्ञा अधिक है, इसलिए तो राज को बड़े-बड़े दुःख होते हैं। आसङ्ग-काष्ठ (?) के
समान राजा संसार के लिए थकता है ॥४५॥
राज्ये नृपस्त्यागिनि बह्वमित्रे विश्वासमागच्छति चेद्विपन्नः ।
अथापि विश्रम्भमुपैति नेह किं नाम सौख्यं चकितस्य राज्ञः ॥११.४६
त्याग करनेवाले (= क्षण-भङ्गुर) व बहुत शत्रुओं से भरे राज्य में यदि (राजा) विश्वास करता है, तो मरता
है और यदि उस (राज्य) में विश्वास नहीं करता है, तो भय-भीत रहनेवाले राजा को सुख क्या है? ॥४६॥
58 अश्वघोष