बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रायुधश्चौग्रधृतायुधोऽपि येषां कृते मृत्युमवाप भीष्मात् ।
चिन्तापि तेषामशिवा वधाय तद्व्रत्तिनां किं पुनरव्रतानाम् ॥११.१८
उग्र अस्त्र धारण करनेवाले, उग्रायुध ने भी जिनके कारण भीष्म से मौत पाई, उनकी चिन्ता भी
अमङ्गलजनक है, और सदाचारियों के लिए भी घातक है, फिर अव्रतियों का क्या कहना? ॥18॥
आस्वादमल्पं विषयेषु मत्वा संयोजनोत्कर्षमतृप्तिमेव ।
सद्द्र्यश्च गर्हा नियतं च पापं कः कामसञ्ज्ञं विषमाददीत ॥११.१९
विषयों में स्वाद कम है, बन्धन अधिक हैं, केवल अतृप्ति है, सज्जनों द्वारा निन्दा होती है, और पाप नियत
है—ऐसा समझकर कौन कामनामक विषयों को ग्रहण करे? ॥19॥
कृष्यादिभिः कर्मभिरर्दितानां कामात्मकानां च निशम्य दुःखम् ।
स्वास्थ्यं च कामेष्वकुतूहलानां काममन्विहातुं क्षममात्मवद्भिः ॥११.२०
कृषि आदि कर्मों से पीड़ित रहनेवालों का स्वास्थ्य (= सुख, शान्ति, प्रसन्नता) देखकर, आत्मवान्
(= संयतात्मा) लोगों के लिए काम का त्याग करना ही उचित है ॥20॥
ज्ञेया विपत्कामिनि कामसम्पत्सिद्धेषु कामेषु मदं ह्युपैति ।
मदादकार्यं कुरुते न कार्यं येन क्षतो दुर्गतिमभ्युपैति ॥११.२१
कामी व्यक्ति में कामरूपी सम्पत्ति को विपत्ति ही समझना चाहिए; क्योंकि काम सिद्ध होनेपर मद होता
है। मद से मनुष्य अकार्य करता है, कार्य नहीं, जिससे घायल होकर वह दुर्गति को प्राप्त होता है ॥21॥
यत्नेन लब्धाः परिरक्षिताश्च ये विप्रलभ्य प्रतियान्ति भूयः ।
तेष्वात्मवान्याचितकोपमेषु कामेषु विद्वानिह को रमेत ॥११.२२
यत्नपूर्वक पाये गये और रखे गये जो (काम) ठगकर फिर चले जाते हैं, इस संसार मे माँगी गई वस्तुओं
के समान उन कामों (= विषयों) में कौन आत्मवान् (= संयतात्मा) बुद्धिमान् रत होगा? ॥22॥
अन्विष्य चादाय च जाततर्षा यानत्यजन्तः परियान्ति दुःखम् ।
लोके तृणोल्कासदृशेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२३
जिन्हें खोजकर और पाकर तृष्णा होती है, जिन्हें नही छोड़ने में (लोग) दुःख पाते हैं, संसार मे तृणों की
उल्का के समान उन कामों (= विषयों) में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥23॥
अनात्मवन्तो हृदि यैर्विदग्धा विनाशमर्च्छन्ति न यान्ति शर्म ।
क्रुद्धोग्रसर्पप्रतिमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२४
अनात्मवान् (= असंयतात्मा) जिनके द्वारा हृदय में डँसे जानेपर नष्ट हो जाते हैं, शान्ति नही पाते, क्रुद्ध उग्र
साँपों के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥24॥
अस्थि क्षुधार्त्ता इव सारमेया भुक्त्वापि यान्नैव भवन्ति तृप्ताः ।
जीर्णास्थिकङ्कालसमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२५
जैसे हड्डी चबाकर भी भूखे कुत्ते तृप्त नही होते हैं वैसे ही जिन्हें भोगकर भी (लोग) तृप्त नही होते हैं, जीर्ण
अस्थि-पञ्जर (= पुरानी ठठरी) के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥25॥
ये राजचोरोदकपावकेभ्यः साधारणत्वान्नजयन्ति दुःखम् ।
तेषु प्रविद्धाभिषसन्निभेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२६
राजा चोर जल व अग्नि का समान अधिकार होने के कारण जो (काम) दुःख पैदा करते हैं, फेके हुए मांस
के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥26॥⁴⁶
यत्र स्थितानामभितो विपत्तिः शत्रोः सकाशादपि बान्धवेभ्यः ।
हिंस्रेषु तेष्वायतनोपमेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२७
जहाँ रहनेवालों (जिनमें रमनेवालों) पर चारों ओर से विपत्ति है, शत्रु के समीप से, और बन्धुओं के समीप
से, यज्ञशालाओं के समान उन हिंसक कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥27॥
गिरौ वने चाप्सु च सागरे च यान् भ्रंशमर्च्छन्ति विलङ्घमानाः ।
तेषु द्रुमप्राग्रफलोपमेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२८
पर्वत पर, वन में, जल में और सागर में जिन्हें खोजते हुए भ्रष्ट होते हैं, वृक्ष-शिखर पर के फलों के समान
उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥28॥
तीव्रैः प्रयत्नैर्विविधैर्हवाप्ताः क्षणेन ये नाशमिह प्रयान्ति ।
स्वप्नोपभोगप्रतिमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२९
विविध तीव्र प्रयत्नों से प्राप्त होकर जो क्षण-भर में इस संसार में नष्ट हो जाते हैं, स्वप्न-उपभोग के समान
उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥29॥
यानर्जयित्वापि न यान्ति शर्म विवर्धयित्वा परिपालयित्वा ।
अङ्गारकर्षूंप्रतिमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३०
जिन्हें अर्जन कर, बढ़ाकर और पालकर भी (लोग) शान्ति नही पाते, अङ्गारे की आग के समान उन कामों
में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥30॥
विनाशमीयुः कुरवो यदर्थं वृष्ण्यन्धका मेखलदण्डकाश्च ।
शूनासिकाहप्रतिमेषु तेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३१
जिनके लिए कौरव वृष्ण्यन्धक व मेखलदण्डक विनाश को प्राप्त हुए, वध-स्थल के छुरे व काठ के समान
उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥31॥⁴⁷
⁴⁶ - (26, 27) काम = उपभोग की वस्तुएँ। सोने चाँदी लाखों-करोड़ों सिक्कों को मैं श्रेष्ठ धन नही कहता।
उसमें तो भय-ही-भय है—राजा का, अग्नि का, जल का, चोर का, लुटेरे का और अपने सगे सम्बन्धियों तक का
भय है= बु० वा०।
⁴⁷ - (31-32) जुए के लिए कौरवों का, मद्यपान के लिए वृष्ण्यन्धकों का और स्त्री के लिए सुन्द-उपसुन्द का
विनाश हुआ।
बुद्धचरित 57