बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवास्तुविद्याध्यायः ५९
वक्रा अस्पष्टा पादेनालिखिता च या रेखा सा शत्रुभयं रिपुभीतिं क्लेशांश्च ददाति।
विरूपा च या रेखाऽदृश्याऽथवा चित्तद्गाह्लादिनी न भवति साऽपि च शब्दाच्छत्रुभयक्लेशदा।
चर्मणा अङ्गारकेण वाऽस्थ्ना दन्तेन वा कृता रेखा भवति, तदा भर्तुर्गृहस्वामिनोऽशिवाय
न श्रेयसे भवति।
अपसव्येन स्वासव्येन स्वादक्षिणेन लिखिता वैरं करोति। प्रदक्षिणेन या च लिखिता
तया सम्पदः समृद्धयो निर्दे्श्या वक्तव्याः। वामभागाद् दक्षिणभागे दक्षिणे नीयते सा
प्रदक्षिणगता रेखा। तथा च प्रश्नकाले वाचो गिरः परुषा रूक्षा असङ्गतियुक्तिवादिन्यः।
निष्ठीवितं श्लेष्मत्यागो मुखात् सद्यः। क्षुतं च नासाशब्दः। गृहारम्भकाले अशुभमनिष्टं
कथितमुक्तम्॥९९-१०२॥
अधुना शल्यज्ञानं विवक्षुरादावेव तत्र विधानमाह—
अर्द्धनिचितं कृतं वा प्रविशन् स्थपतिर्गृहे निमित्तानि।
अवलोकयेद् गृहपतिः क्व संस्थितः स्पृशति किं चाङ्गम्॥१०३॥
रविदीप्तो यदि शकुनिस्तस्मिन् काले विरौति परुषरवम्।
संस्पृष्टाङ्गसमानं तस्मिन् देशेऽस्थि निर्दे्श्यम्॥१०४॥
आधे बने या सम्पूर्ण बने हुये गृह में प्रवेश करता हुआ कारीगर आगे कथित चिह्नों
को देखे कि गृहस्वामी कहाँ पर स्थित है और किस अङ्ग का स्पर्श कर रहा है? उस
समय दीप्त दिशा में स्थित पक्षीगण कठोर शब्द करते हों तो जिस स्थान पर गृहपति
खड़ा हो उसके नीचे तथा जिस अङ्ग को गृहपति ने स्पर्श कर रक्खा हो, तत्तुल्य अङ्ग
की हड्डी कहनी चाहिये। उदयकाल से एक-एक प्रहर क्रम से पूर्व आदि दिशा में सूर्य
रहता है। जैसे कि उदयकाल से एक प्रहर तक पूर्व में, तत्पश्चात् क्रमशः द्वितीय प्रहर
तक आग्नेय कोण में, तृतीय प्रहर तक दक्षिण में एवं सायंकाल तक नैर्ऋत्य कोण में;
तत्पश्चात् रात्रि के प्रथम प्रहर तक पश्चिम में, द्वितीय प्रहर तक वायव्य कोण में, तृतीय
प्रहर तक उत्तर में और रात्रि के चतुर्थ प्रहर तक ईशान कोण में सूर्य रहता है। जिस
दिशा का सूर्यने परित्याग कर दिया हो वह 'अङ्गारिणी', जिसमें स्थित हो वह 'दीप्त',
जिसमें जाने वाला हो वह 'धूमित' और शेष पाँच दिशायें 'शान्त' कहलाती हैं। जैसे कि
उदय से प्रथम प्रहर तक ईशान कोण अङ्गारिणी, पूर्व दिशा दीप्त, आग्नेय कोण धूमित
और शेष पाँच दिशायें शान्तसंज्ञक होती हैं॥१०३-१०४॥
गृहं वेश्म अर्धनिचितमर्धकृतं कृतं वा निःशेषं रचितं तत्र प्रविशन्नन्तर्विशन् स्थपति-
वर्धकिः प्रविश्य निमित्तानि चिह्नान्यवलोकयेत् पश्येत्। गृहपतिर्गृहस्वामी क्व संस्थितः,
कस्मिन् स्थाने समवस्थितो वास्तुनरस्य कस्मिन्नवयवे स्थितः, किं चाङ्गं स्वावयवं स्पृशति।
एतदप्यवलोकयेद् रविदीप्त इति। अत्र तावद्दीप्तदिगलक्षणं व्याख्यायते। तद्यथा—
सूर्योदयात् प्रभृति दिनस्य प्रथमप्रहरं यावत् तावदैशानी दिग्दङ्गारिणी पूर्वा दीप्ता आग्नेयी
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