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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 760 में से

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पृष्ठ 86

५८ बृहत्संहिता
नानाकारैर्बहुभिर्भक्ष्यैरपूपमोदकैर्लोपिकाप्रभृतिभिः। तथा दध्ना, अक्षतैश्च यवैः, सुरभिभिः
सुगन्धैः, कुसुमैः पुष्पैः, धूपैश्च सुगन्धैर्देवतपूजां दैवतानां पूजामर्चां क्षेत्रपतेश्च कृत्वा विधाय,
ततः स्थपतीन् विप्रान् ब्राह्मणांश्चाभ्यर्च्य सम्पूज्य।
विप्रः स्पृष्ट्वा शीर्षमिति। गृहपतिर्विप्रो ब्राह्मणो यदि भवति तदा शीर्षं स्वमूर्धानं
स्पृष्ट्वा येन केनचिदभीष्टेन वस्तुना यथाचरितां रेखां कुर्यात्। एवं क्षत्रियो वक्षः स्पृष्ट्वा,
वैश्यश्चोरू स्पृष्ट्वा, शूद्रः पादौ स्पृष्ट्वा गृहारम्भे रेखां कुर्यात्।।९६-९८।।
तस्यां कृतायां लक्षणमाह—
अङ्गुष्ठकेन कुर्यान्मध्याङ्गुल्याऽथवा प्रदेशिन्या।
कनकमणिरजतमुक्तादधिफलकुसुमाक्षतैश्च शुभम् ।।९९।।
शस्त्रेण शस्त्रमृत्युर्बन्धो लोहेन भस्मनाग्निभयम्।
तस्करभयं तृणेन च काष्ठोल्लिखिता च राजभयम् ।।१००।।
वक्रा पादालिखिता शत्रुभयक्लेशदा विरूपा च।
चर्माङ्गारास्थिकृता दन्तेन च भर्तुरशिवाय ।।१०१।।
वैरमपसव्यलिखिता प्रदक्षिणं सम्पदो विनिर्देश्याः।
वाचः परुषा निष्ठीवितं क्षुतं चाशुभं कथितम् ।।१०२।।
यदि अँगूठा, मध्यमा, प्रदेशिनी, सोना, चाँदी, मोती, दही, फल, फूल या अक्षत से
गृहारम्भ की रेखा बनायी जाय तो गृहपति के लिये वह रेखा शुभ होती है। यदि उक्त
रेखा शस्त्र से बनाई जाय तो शस्त्र से ही गृहस्वामी की मृत्यु, लोहे से बनाई जाय तो
बन्धन, भस्म से बनाई जाय तो अग्निभय, तृण से बनाई जाय तो चोरभय और काष्ठ से
बनाई जाय तो राजभय होता है। टेढ़ी, पाँव से बनाई गई या रूपरहित रेखा शत्रुभय और
कष्ट प्रदान करने वाली होती है। चमड़ा, कोयला, हड्डी या दाँत से बनाई गई रेखा
गृहपति के लिये अशुभ होती है। वाम क्रम से बनाई गई रेखा शत्रुता और प्रदक्षिण क्रम
से बनाई गई रेखा सम्पत्ति प्रदान करने वाली होती है। गृहारम्भ काल में कठोर वचन
बोलना, थूकना और छींकना अशुभकारी होता है।।९९-१०२।।
तां रेखां यदि गृहपतिरङ्गुष्ठकेन कुर्यात्, मध्याङ्गुल्याऽथवा प्रदेशिन्या वा ज्येष्ठाङ्गुल्य-
ङ्गुष्ठद्वितीया प्रदेशिनी, तृतीया मध्यमा, चतुर्थ्यनामिका, पञ्चमी कनिष्ठिका, कनकेन सुवर्णेन,
मणिना वा रजतेन रूप्येण, मुक्ताभिर्वा, दध्ना, फलेन श्रीफलादिना, कुसुमेन पुष्पेण वा,
अक्षतैैर्यवैर्वा, एतेषामन्यतमेन यदि वा करोति, तदा शुभं भर्तुः शुभं करोति।
शस्त्रेणेति। तां रेखां यदि शस्त्रेण करोति, तदा शस्त्रेणैव गृहपतेर्मृत्युः। एवं लोहेन
बन्धो बन्धनम्। भस्मना अग्निभयं वह्निभीतिम्। तृणेन च तस्करभयं चौरभीतिम्। काष्ठे-
नोल्लिखिता रेखा राजभयं राजभीतिं करोति।
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