बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवास्तुविद्याध्यायः ५५
अन्यदप्याह—
श्वभ्रमथवाऽम्बुपूर्णं पदशतमित्वा गतस्य यदि नोनम्।
तद्धन्यं यच्च भवेत् पलान्यपामाढकं चतुःषष्टिः ॥९१॥
पूर्वकथित प्रकार से गड्ढे को खोदने के पश्चात् उसमें जल भर कर वहाँ से सौ पद
तक दूर जाकर पुनः वापस आने पर यदि गड्ढे का जल ज्यों का त्यों बना रहे तो शुभ
होता है। इसी प्रकार वहाँ की धूली से एक आढक प्रमाण वाली टोकरी को भर कर
पुनः उस धूली को तौलने पर यदि वह धूली चौंसठ पल के बराबर हो तो वह भूमि
शुभ होती है॥९१॥
अथवा श्वभ्रमवटं पूर्वोक्तमेवाम्बुना जलेन परिपूर्णं कृत्वा ततः पदशतं क्रमशतमित्वा
गत्वा ततः पुनरागत्य यदि तज्जलमूनं न भवति तद्धन्यं शुभमिति, अन्यथा अधन्यम्।
अथवा यत्र मृत्तिकानामाढकमपामम्बूनां चतुःषष्टिः पलानि भवेत्तद्धन्यमेव। एतदुक्तं भवति—
भूमौ मृत्तिकां संगृह्य अवटनिर्गतां तथा आढकमापूर्य तोलयेत्। तद्यदि चतुःषष्टिः पलानि
भवन्ति तद्धन्यं नान्यथेति। तथा च पराशरः—
‘निमेषशतमतीत्याखातश्वभ्रगतजलगतां चारिणीं समुद्धतामापूर्यमाणामतिरक्तां मृदं
चतुःषष्टिपलाढकां तुल्यां च’ इति॥९१॥
अन्यदप्याह—
आमे वा मृत्पात्रे श्वभ्रस्थे दीपवर्तिरभ्यधिकम्।
ज्वलति दिशि यस्य शस्ता सा भूमिस्तस्य वर्णस्य ॥९२॥
चार बत्ती वाला दीपक जलाकर मिट्टी के कच्चे बर्तन में रखकर उनमें उत्तर आदि
क्रम से ब्राह्मण आदि वर्णों की कल्पना करते हुये उस बर्तन को गड्ढे में स्थापित करने
पर जिस दिशा की बत्ती देर तक जलती रहे, उस दिशा के वर्ण के लिये वह भूमि शुभ
होती है॥९२॥
अथवा आमे अपक्वे मृत्पात्रे मृन्मये भाण्डे श्वभ्रस्थे श्वभ्रान्तरगते, तत्र वर्णानामचिह्नैश्चतस्रो
दीपवर्तीर्दत्वा ज्वालयेत्, तुल्यकालं ताश्च समाः समाः कार्याः। यस्य वर्णस्य दिश्यभ्यधिकं
चिरकालं दीपवर्ती ज्वलति, तस्यैव वर्णस्य सा भूः शस्ता शुभा नान्यस्येति॥९२॥
अन्यदप्याह—
श्वभ्रोषितं न कुसुमं यस्य प्रम्लायतेऽनुवर्णसमम्।
तत्तस्य भवति शुभदं यस्य च यस्मिन् मनो रमते ॥९३॥
सायङ्कल ब्राह्मण आदि वर्णतुल्य वर्ण वाले पुष्पों (सफेद, लाल, पीले और काले
पुष्पों) को लेकर गड्ढे में डाल दे और दूसरे दिन प्रातःकाल उन पुष्पों को निकाल कर
देखने पर जिस वर्ण का पुष्प कुम्हलाया न हो, उसके लिये वह भूमि शुभ होती है।
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