बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ बृहत्संहिता
चैत्यवृक्षः कल्पवृक्षः। तथा च पुराणे—
मन्दरस्य गिरः शृङ्गे महावृक्षः स केतुराट्।
आलम्बशाखाशिखरः कदम्बश्चैत्यपादपः।। इति।
वल्मीकसङ्कुले वल्मीकावृते भूभागे। श्वभ्रसङ्कुले च श्वभ्रावृते समीपस्थे विपदो व्यापदो
भवन्ति। गर्ता प्रसिद्धा चिता तस्यां समीपवर्तिन्यां पिपासा तृषा भवति। कूर्माकारे भूभागे
समीपस्थे धनविनाशो वित्तक्षयो भवति।।८७-८८।।
अथापरं भूमिलक्षणमाह—
उदगादिप्लवमिष्टं विप्रादीनां प्रदक्षिणेनैव ।
विप्रः सर्वत्र वसेदनुवर्णमथेष्टमन्येषाम् ।।८९।।
उत्तर की ओर ढलान वाली भूमि ब्राह्मणों के लिये, पूर्व की ओर ढलान वाली
भूमि क्षत्रियों के लिये, दक्षिण की ओर ढलान वाली भूमि वैश्यों के लिये और पश्चिम
की ओर ढलान वाली भूमि शूद्रों के लिये शुभ होती है।
चारो ओर ढलान वाली भूमि में भी ब्राह्मण गृह का निर्माण करा सकता है; लेकिन
शेष वर्णों के लिये अपनी-अपनी दिशा की ढलान वाली भूमि पर ही गृह-निर्माण
कराना शुभदायक होता है।।८९।।
विप्रादीनां ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राणामुदगादिप्लवं प्रदक्षिणेन भूभागेनेष्टं शुभम्।
प्लवशब्देन निम्नत्वमुच्यते। तद्यथा—उदक्प्लवा भूब्राह्मणानां प्रशस्ता। पूर्वप्लवा क्षत्रियाणाम्।
दक्षिणप्लवा वैश्यानाम्। पश्चिमप्लवा शूद्राणाम्। विप्रो ब्राह्मणः सर्वत्र सर्वस्यां भूमौ वसेदुत्तर-
पूर्वदक्षिणपश्चिमप्लवायामिति। अन्येषां क्षत्रियादीनामनुवर्णनमथेष्टं वर्णानुक्रमेण शोभनम्।
तद्यथा—पूर्वप्लवा दक्षिणप्लवा पश्चिमप्लवा क्षत्रियाणाम्। दक्षिणप्लवा पश्चिमप्लवा वैश्या-
नाम्। पश्चिमप्लवा शूद्राणामेवेति।।८९।।
अथ भूमेर्विधानवशेन शुभाशुभमाह—
गृहमध्ये हस्तमितं खात्वा परिपूरितं पुनः श्वभ्रम् ।
यद्यूनमनिष्टं तत् समे समं धन्यमधिकं यत् ।।९०।।
गृहकर्ता के हाथ से गृहमध्य में एक हाथ लम्बा, एक हाथ चौड़ा और एक हाथ
गहरा गड्ढा खोदकर पुनः उस गड्ढे को उसी मिट्टी से भरे, यदि गड्ढे को भरने में गड्ढे से ही
निकाली गई मिट्टी कम पड़ जाय तो अशुभ, पूरी तरह से गड्ढा भर जाय तो सम और
गड्ढा भरकर मिट्टी ज्यादा हो जाय तो शुभ होता है।।९०।।
गृहमध्ये भवनान्तर्हस्तमितं समप्रमाणं श्वभ्रमवटं खात्वा समन्ततः परिवर्तुलं हस्ता-
यतं हस्तमात्रगम्भीरं पुनर्भुयः परिपूरितं तयैव मृत्तिकया यद्यूनं भवति, तदानिष्टमशुभं समे
समं, न शुभं नाप्यशुभमित्यर्थः । यदधिकं भवति तद्धन्यं शुभमित्यर्थः ।।९०।।
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