बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 81, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंवास्तुविद्याध्यायः ५३
अप्यध्वनि श्रमविनोदमुपागतानां
धत्ते श्रियं किमुत शाश्वतमन्दिरेषु ॥८६॥
प्रशस्त औषधी वाली, द्रुम ( याज्ञिक वृक्ष = पलाश आदि ) वाली, लताओं से युत,
मधुर मिट्टी वाली, सुगन्धि वाली, निर्मल, समान और छिद्ररहित भूमि मार्ग में गमन से
उत्पन्न श्रम को हटाने की इच्छा से वहाँ पर थोड़ी देर के लिये बैठे मनुष्य को भी लक्ष्मी
प्रदान करती है। फिर ऐसी भूमि जिनके घर के पास में ही सदा रहती हो, उनके सम्बन्ध
में तो कहना ही क्या? अर्थात् उनको तो अवश्य ही लक्ष्मी की प्राप्ति कराती है।।८६।।
एवंविधा भूर्नराणां पुरुषाणामध्वनि पथि श्रमविनोदमुपागतानां श्रमापनयनं प्राप्तानामपि
क्षमाऽत्रावस्थितत्वादपि श्रियं लक्ष्मीं धत्ते ददाति, किमुत शाश्वतमन्दिरेषु किं पुनर्यै शाश्वतं
स्थिरं मन्दिरं गृहं कृत्वा तत्र निवसन्ति। शस्तौषधिद्रुमलता, शस्ता औषधयो जाया-
जयन्ती-जीवन्ति-जीवपुत्रा एवमादिका यत्र। द्रुमा वृक्षा याज्ञिकाः पलाशपिप्पलप्रभृतयः।
लताश्चतततयश्च श्यामलताप्रभृतयश्च यस्याम्। या च भूर्मधुरा मृष्टस्वादा। सुगन्धा शोभन-
गन्धा। स्निग्धा सस्नेहा। समा सर्वत्र तुल्या निम्नोत्तुङ्गै रहिता। न सुषिरा अन्तःसारा।।८६।।
अन्यद् गृहे शुभफलं सन्निवेशवशेनाह—
सचिवालयेऽर्थनाशो धूर्तगृहे सुतवधः समीपस्थे ।
उद्वेगो देवकुले चतुष्पथे भवति चाकीर्तिः ॥८७॥
चैत्ये भयं ग्रहकृतं वल्मीकश्वभ्रसङ्कुले विपदः ।
गर्त्तायां तु पिपासा कूर्माकारे धनविनाशः ॥८८॥
गृह के समीप में मन्त्री का घर हो तो धननाश, धूर्त का गृह हो तो पुत्रनाश, देवता
का गृह हो तो चित्त में खेद, चौराहा हो तो अकीर्ति और चैत्य ( प्रधान ) वृक्ष हो तो
ग्रहों का भय होता है। दीमक ( वाँबी = दिवाड़ ) युत या पोली भूमि गृह के समीप हो
तो गृहस्वामी के ऊपर आपत्ति आती है। गृह के समीप गड्ढा हो तो प्यास का रोग और
कछुये के समान आकृति वाली भूमि गृह के समीप हो तो गृहस्वामी के धन का नाश
होता है।।८७-८८।।
सचिवालये मन्त्रिगृहे समीपस्थे निकटवर्तिनि अर्थनाशो धनविनाशः। धूर्तः परवञ्चना-
दक्षः। धूर्तगृहे समीपस्थे सुतवधः पुत्रमरणम्। देवकुले सुरगृहे समीपस्थे उद्वेगश्चित्तखेदः।
चतुष्पथे चत्वारः पन्थानो यत्र तस्मिंश्चाकीर्तिर्लोकापवादः।
चैत्य इत्यनेन चैत्यवृक्षाः परिगृह्यन्ते। चैत्यवृक्षे आसन्ने भयं ग्रहकृतं ग्रहोत्पन्ना भीति-
र्गृहभर्तुर्भवति। ग्रहा भूतानि। तथा च बृहस्पतिराह—
चैत्यवृक्षेषु भूतेभ्यः कृच्छ्रावासः पुरा ह्ययम्।
अरतिस्त्वभिवर्धेत निविष्टैः कण्टकिद्रुमैः।। इति।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA