बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० बृहत्संहिता
द्वारं द्वारस्योपरि यत्तन्न शिवाय सङ्कटं यच्च।
आव्यातं क्षुद्भयदं कुब्जं कुलनाशनं भवति ॥७८॥
पीडाकरमतिपीडितमन्तर्विनतं भवेदभावाय ।
बाह्यविनते प्रवासो दिग्भ्रान्ते दस्युभिः पीडा ॥७९॥
जिस गृह के द्वार का किवाड़ बिना खोले ही खुल जाय, उसमें रहने वाले उन्माद,
अपने-आप बन्द हो जाय तो कुल का नाश, पूर्वकथित परिमाण से अधिक द्वार का
परिमाण हो तो राजभय और प्रमाण से अल्प परिमाण वाला द्वार हो तो चोरभय एवं
दुःख होता है। यदि एक घर के द्वार पर दूसरे खण्ड का द्वार पड़े तो शुभ नहीं होता।
जिस द्वार की मोटाई अल्प हो, वह भी शुभ नहीं होता है। मृदङ्ग की आकृति वाला अति
विपुल द्वार क्षुधा का भय करता है और कुबड़ा द्वार कुल का नाश करता है। यदि ऊपरी
काष्ठ आदि के भार से दबा हुआ द्वार हो तो गृहस्वामी को पीड़ा देता है, भीतर की ओर
झुका हुआ द्वार हो तो गृहस्वामी की मृत्यु कराता है, बाहर को झुका हुआ द्वार गृहस्वामी
को प्रवासी बनाता है और दिग्भ्रान्त ( जिस दिशा का द्वार हो, उससे भिन्न दिशा को
देखता ) हो तो गृहस्वामी को चोरों से पीड़ित कराता है॥७७-७९॥
स्वयमुद्घाटित आत्मनैवोद्घाटिते द्वारकपाटे उन्मादश्चित्तस्य भवति। स्वयं पिहिते
निपीडिते कुलस्य वंशस्य विनाशः स्वयं भवति। मानाधिके उक्तस्वप्रमाणादभ्यधिके द्वारे
नृपभयं राजभीतिर्भवति। नीचे प्रमाणादल्पे दस्युभयं चौरभीतिर्व्यसनं दुःखं च भवति।
द्वारस्योपरि यद्द्वारं तन्न शिवाय न श्रेयसे भवति। यच्च सङ्कटं पृथुत्वेनाल्पं तच्च
न शिवायैव भवति। आव्यातमतिविपुलं मुरजाकारं क्षुद्भयं ददाति। कुब्जमस्पष्टं द्वारं
कुलनाशनं वंशक्षयावहं भवति।
अतिपीडितमुदुम्बरेणातिपीडितं गृहस्वामिनः पीडां करोति। अन्तर्गृहाभ्यन्तरे विनतं
द्वारमभावाय मरणाय स्वामिनो भवति। बाह्यविनते बहिर्गते द्वारे प्रवासो भवत्यन्यदेशनिवासः।
दिग्भ्रान्ते दिक्स्थे अन्यां दिशं प्रेक्षमाणे दस्युभिborderः पीडा भवति॥७७-७९॥
अत्रैव विशेषमाह—
मूलद्वारं नान्यैर्द्वारैरभिसन्दधीत रूपर्द्ध्या।
घटफलपत्रप्रमथादिभिश्च तन्मङ्गलैश्चिनुयात् ॥८०॥
सुन्दरता को व्यक्त करने वाली जितनी सामग्रियों को एकत्र कर मूल द्वार की रचना
की गई हो, उतनी सामग्रियों से अन्य द्वारों की रचना नहीं करनी चाहिये। साथ ही कलश,
श्रीफल, पत्र, पुष्प आदि से उस मूल द्वार की शोभा बढ़ानी चाहिये॥८०॥
मूलद्वारं प्रधानमिति यावत्। तच्चान्यैरपरैर्द्वारैः रूपर्द्ध्या रूपसमृद्ध्या नाभिसन्दधीत
न सन्धानं कुर्यात्। एतदुक्तं भवति—मूलद्वारस्य यादृशी रचना कृता, तादृशी नान्यद्वाराणां
कार्येति। तच्च मूलद्वारं मङ्गलैः घटैः कलशैः फलैः श्रीफलादिभिः पत्रैः पत्रलतादिभिर्वा
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