सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 79

वास्तुविद्याध्यायः ५१
प्रमथैर्गणैः, आदिग्रहणात् सिंहव्यालहंसजीवजीवकैश्चिनुयाद् उपचितं कुर्यात्।।८०।।
अथ कोणचतुष्टये गृहादीनां ये दोषा निवसन्ति तांस्तन्निवासिनां च फलमाह—
ऐशान्यादिषु कोणेषु संस्थिता बाह्यतो गृहस्यैताः ।
चरकी विदारिनामाऽथ पूतना राक्षसी चेति ॥८१॥
पुरभवनग्रामाणां ये कोणास्तेषु निवसतं दोषाः ।
श्वपचादयोऽन्त्यजात्यास्तेष्वेव विवृद्धिमायान्ति ॥८२॥
गृह के बाहर ईशान आदि चारो कोनों में क्रम से चरकी, विदारिका, पूतना और राक्षसी
का निवास होता है। पुर, भवन और ग्रामों के जो कोने हों, उनमें निवास करने वाले को
दोष होता है; किन्तु श्वपच ( चाण्डाल, डोम आदि ), अन्त्यज ( चमार आदि ) नीच जातियों
के वहाँ ( कोने में ) निवास करने से गृहस्वामी की उन्नति होती है॥८१-८२॥
अथैशान्यं चरकी, आग्नेय्यां विदारिनामा, नैर्ऋते पूतना, वायव्ये राक्षसी चेत्येवं प्रकारा
बहिष्कोणेषु निवसन्ति। शास्त्रान्तरेष्वष्टौ पठ्यन्ते—
स्कन्दोऽर्यमा जम्बुकाख्यः पिलिपिञ्जस्तथापरः।
प्राच्यादिदिक्चतुष्के तु निवसन्ति महाग्रहाः।।
कोणेष्वाचार्योक्ता एव।
ऐशान्यां चरकी प्रोक्ता स्कन्दः प्राग्भागसंस्थितः।
हौताशन्यां विदारी च याम्यां चैवार्यमा स्थितः।।
पूतना नैर्ऋते ज्ञेया जम्बुकः पश्चिमे स्थितः।
राक्षसी चानिले कोणे पिलिपिञ्जस्तथोत्तरे।।
इत्याचार्योक्तः पक्षः शोभनः।
पुरभवनेति। पुरं नगरम्। भवनं गृहम्। ग्रामः प्रसिद्धः। तेषां ये कोणाश्चत्वारस्तेषु
निवसतां निवसमानानां दोषा भवन्ति। तेष्वेव कोणेषु श्वपचादयः, श्वपचा डोमाः। आदि-
ग्रहणात् चण्डालपुक्कसप्रभृतयः। अन्त्यजात्याश्चर्मकारप्रभृतयः। एते निवसमाना विवृद्धिमा-
यान्ति वृद्धिमाप्नुवन्ति, नान्य इति।।८१-८२।।
अथ दिक्षु शुभाशुभान् वृक्षानाह—
याम्यादिष्वशुभफला जातास्तरवः प्रदक्षिणेनैते ।
उदगादिषु प्रशस्ताः प्लक्षवटोडुम्बराश्वत्था ॥८३॥
पाकर, वट, गूलर और पीपल—ये चार वृक्ष प्रदक्षिणक्रम से दक्षिण आदि दिशाओं
में अशुभ और उत्तर आदि दिशाओं में शुभ होते हैं। जैसे—दक्षिण में पाकर, पश्चिम में
वट, उत्तर में गूलर और पूर्व में पीपल का वृक्ष अशुभ तथा उत्तर में पाकर, पूर्व में वट,
दक्षिण में गूलर और पश्चिम में पीपल का वृक्ष शुभ होता है॥८३॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA