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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

४२ बृहत्संहिता
स्त्रीदोषाः सुतमरणं प्रेष्यत्वं चापि चरणवैकल्ये।
अविकलपुरुषे वसतां मानार्थयुतानि सौख्यानि ॥६६॥
यदि वास्तु पुरुष की दक्षिण भुजा हीन हो तो गृहस्वामी को धननाश और स्त्रीकृत
दोष होता है। इसी प्रकार यदि वाम भुजा हीन हो तो गृहस्वामी के धन-धान्यों का नाश,
शिर हीन हो तो धन, आरोग्य आदि सब गुणों का नाश तथा चरण हीन हो तो स्त्रीदोष,
पुत्र की मृत्यु और दासत्व की प्राप्ति होती है। यदि वास्तु पुरुष के सभी अङ्ग पूर्ण हों तो
उस स्थान में निवास करने वाले मनुष्य को मान और धन से समन्वित सुख की प्राप्ति
होती है॥६५-६६॥
वास्तुनरे वास्तुपुरुषे दक्षिणेन सव्येन भुजेन बाहुना हीने रहितेऽर्थक्षयो वित्तनाशः,
अङ्गनादोषाः स्त्रीकृता दोषा भवन्ति। वामेऽपसव्ये भुजे हीने वास्तुनरे अर्थानां धनानां धान्यानां
च हानिर्विनाशो भवति। शिरसि मूर्धनि हीने वास्तुनरे सर्वैर्निःशेषैर्गुणैरारोग्यादिभिर्हीयते
रहितो भवति।
चरणवैकल्ये पादभागहीने वास्तुनरे स्त्रीदोषा योषित्प्रभवा दोषाः सुतमरणं पुत्रविपत्तिः
प्रेष्यत्वं दासत्वं चापि भवति। अविकलपुरुषे परिपूर्णावयवे वास्तुनरे वसतां पुंसां मानार्थयुतानि
सौख्यानि भवन्ति॥६५-६६॥
न केवलं वास्तुनरस्यायं प्रविभागो यावन्नगरग्रामेष्वप्येवमेवेत्याह—
गृहनगरग्रामेषु च सर्वत्रैवं प्रतिष्ठिता देवाः।
तेषु च यथानुरूपं वर्णा विप्रादयो वास्याः ॥६७॥
इसी प्रकार से गृह, नगर और ग्रामों में सभी देवगण विराजमान रहते हैं। उन नगर
और ग्रामों में ब्राह्मण आदि वर्णों को भी यथाक्रम निवास करना चाहिये॥६७॥
एवमनेनैव प्रकारेण गृहे वेश्मनि नगरे पुरे ग्रामे चैतेष्वपि सर्वत्र सर्वस्मिन् देशे देवाः
सुराः प्रतिष्ठिताः परिकल्पिताः। एतदुक्तं भवति—यथा गृहे वास्तुनरस्य परिकल्पना कृता
तथैव नगरे ग्रामे च कार्या। तत्रापि च यानि मर्माणि तानि प्राग्वच्चिन्तनीयानि। तेषु नगर-
ग्रामेषु विप्रादयो ब्राह्मणाद्या वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रा यथाक्रमं वास्या विवासनीयाः।
यत्र दिग्भागे यस्योचितं तत्र वासयेदित्यर्थः॥६७॥
कथमिति तत्प्रतिपादयन्नाह—
वासगृहाणि च विन्द्याद्विप्रादीनामुदग्दिगाद्यानि ।
विशतां च यथा भवनं भवन्ति तान्येव दक्षिणतः ॥६८॥
ब्राह्मण आदि वर्ण को क्रम से उत्तर आदि दिशा में वासगृह बनाना चाहिये। जैसे
ब्राह्मण को उत्तर में, क्षत्रिय को पूर्व में, वैश्य को दक्षिण में और शूद्र को पश्चिम में अपना
निवासस्थान बनाना चाहिये। गृह इस प्रकार बनाना चाहिये, जिससे कि आङ्गन में प्रवेश
करते समय वे गृह दक्षिण की ओर पड़ें। जैसे पूर्वमुख वाले गृह के आङ्गन का द्वार उत्तर
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