बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० बृहत्संहिता
अङ्गारे स्तेनभयं भस्मनि च विनिर्दिशेत्सदाऽग्निभयम् ।
शल्यं हि मर्मसंस्थं सुवर्णरजतादृतेऽत्यशुभम् ॥
मर्मण्यमर्मगो वा निरुणद्ध्यर्थागमं तुषसमूहः । )
अपि नागदन्तको मर्मसंस्थितो दोषकृद् भवति ॥६०॥
उपर्युक्त शल्य यदि काष्ठ का हो तो धनहानि, हड्डी का हो तो पशुओं को पीड़ा और
रोगभय, लोहे का हो तो शस्त्र का भय, कपाल या केश का हो तो मृत्यु, कोयले का हो
तो चोरभय एवं भस्म का हो तो सदा अग्निभय होता है। साथ ही सोना और चाँदी के
अतिरिक्त किसी भी प्रकार का शल्य वास्तु पुरुष के मर्मस्थान में स्थित हो तो अत्यन्त
अशुभ होता है। यदि धान्यों की भूसी मर्मस्थान या किसी अन्य स्थान में स्थित हो तो
वहं धन के आगमन को अवरुद्ध करता है। इसी प्रकार नागदन्त यदि मर्मस्थान में अवस्थित
हो तो दोष उत्पन्न करने वाला होता है; परन्तु वही नागदन्त यदि मर्मस्थान से अतिरिक्त
स्थान में अवस्थित हो तो शुभ होता है॥६०॥
दारुमये काष्ठमये शल्ये धनहानिर्वित्तनाशो भवति। अस्थिकृते शल्ये पशूनां च पीडा
व्यथा रुग्भयानि च भवन्ति। अपिशब्दः सम्भावनायां वर्तते। नागदन्तको हस्तिदन्तः शुभोऽपि
मर्मसंस्थितो दोषकृदनिष्टदो भवति॥६०॥
अथ वंशरज्जुलक्षणं महामर्माणि च प्रदर्शयितुमाह—
रोगाद्वायुं पितृतो हुताशनं शोषसूत्रमपि वितथात् ।
मुख्याद् भृशं जयन्ताच्च भृङ्गमदितेश्च सुग्रीवम् ॥६१॥
तत्सम्पाता नव ये तान्यतिमर्माणि सम्प्रदिष्टानि ।
यश्च पदस्याष्टांशस्तत् प्रोक्तं मर्मपरिमाणम् ॥६२॥
रोग से वायु तक, पिता से शिखी तक, वितथ से शोष तक, मुख्य से भृश तक,
जयन्त से भृङ्ग तक और अदिति से सुग्रीव तक सूत्र बाँधने पर इन सूत्रों के परस्पर नव
सम्पात स्थान वास्तुपुरुष के अतिमर्म स्थान होते हैं। साथ ही एक पद में अष्टमांशतुल्य
मर्मस्थान का परिमाण होता है॥६१-६२॥
रोगादारभ्य वायुमनिलं यावत्सूत्रं तिर्यक् सन्दध्यात्। एवं पितृतो हुताशनं शिखिनं
यावत्। वितथात् सूत्रं शोषं यावन्नयेत्। मुख्याद् भृशं यावज्जयन्ताच्च भृङ्गं यावत्। अदितेश्च
सुग्रीवं यावत्। सम्पाता इति। तदिति सूत्राणां परामर्शः। तेषां सूत्राणां ये परस्परं नव
सम्पातास्तान्यतिमर्माणि महामर्माणि सम्प्रदिष्टान्युक्तानि। पदस्य यश्चाष्टांशोऽष्टमभागस्तन्मर्म-
परिमाणं प्राक्कथितम्। एतदुक्तं भवति—क्षेत्रमेकाशीतिपदं विभक्तं कृत्वा यावत्प्रमाणं
पदमुत्पद्यते तस्याष्टांशं मर्मपरिमाणमिति॥६१-६२॥
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