बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३८ बृहत्संहिता
वज्रपरीक्षा, मुक्तालक्षण, पद्मरागपरीक्षा, मरकतपरीक्षा, दीपलक्षण, दन्तकाष्ठलक्षण,
शाकुनमिश्रफल।।१०।।
गतार्थेयमार्याः।।१०।।
अन्यदप्याह—
अन्तरचक्रं विरुतं श्वचेष्टितं विरुतमथ शिवायाश्च।
चरितं मृगाश्वकरिणां वायसविद्योत्तरं च ततः ।।११।।
अन्तरचक्र, विरुत, श्वचक्र, शिवारुत, मृगचेष्टा, अश्वचेष्टा, वायसविद्या। यहाँ पर
शिवारुताध्याय के अन्तर्गत श्वचेष्टित और गोचेष्टिताध्याय के अन्तर्गत उष्ट्री, व्याघ्री, सिंही
आदि प्रधान सभी जीवों का लक्षण कहा गया है तथा मृग जातियों के मध्य में मार्जार,
व्याघ्र, सूकर, ऊँट आदि जीवों का शृगाल की तरह लक्षण कहा गया है।।११।।
श्वचेष्टितं शिवारुते चान्तर्लीनम्। तथा गोचेष्टितमध्ये उष्ट्रीव्याघ्रीसिंहीप्रधानप्राणिनां
सर्वमेवान्तर्लीनम्। तथा मृगजातीनां मध्ये विडालव्याघ्रवराहसूकरोष्ट्रादीनां शृगालवच्चेष्टित-
लक्षणं कथितम्। अन्तर्लीनं सर्वत्र परिज्ञेयम्। एषां श्ववल्लक्षणं चेष्टितं च सर्वं परि-
ज्ञेयम्।।११।।
अथान्यदप्यध्यायसंग्रहविधिमाह—
पाको नक्षत्रगुणास्तिथिकरणगुणाः सधिष्ण्यजन्मगुणाः।
गोचरमथ ग्रहाणां कथितो नक्षत्रपुरुषश्च ।।१२।।
पाकाध्याय, नक्षत्रगुण, तिथिगुण, करणगुण, नक्षत्रजातक, ग्रहगोचराध्याय, नक्षत्रपुरुष,
रूपसत्र—ये अध्याय इस ग्रन्थ के अन्तर्गत हैं।।१२।।
पाकाध्यायः। नक्षत्रगुणाः। तिथिगुणाः। करणगुणाः। अत्रैव मध्ये राशिगुणाः। पुंसां
क्षुरकर्मकर्णवेधनविवाहादिकं रक्षोपतापशान्तिकर्म च तत्रैवोक्तम्। सह नक्षत्रजन्मगुणश्च
ग्रहगोचराध्यायः। नक्षत्रपुरुषो रूपसत्रं चोक्तं कथितम्।।१२।।
अन्यदप्याह—
शतमिदमध्यायानामनुपरिपाटिक्रमादनुक्रान्तम् ।
अत्र श्लोकसहस्राण्याबद्धान्यूनचत्वारि ।।१३।।
यहाँ पर जिस क्रम से पठित किये गये हैं, उसी क्रम से इस ग्रन्थ में एक सौ
अध्याय बनाये गये हैं। इसमें एक सौ कम चार हजार श्लोक दिये गये हैं। वातचक्र,
अङ्गविद्या, पिटकलक्षण, अश्वलक्षण, गजलक्षण—ये पाँच अध्याय इस प्रमाण से अलग
हैं। इन अध्यायों की पद्यसंख्या मिलाकर कुल चार हजार श्लोक होते हैं।।१३।।
इदं शतमध्यायानामनुपरिपाटिक्रमादनुक्रान्तं रचितम्। येनैव प्रकारेण परिपठितं तेनैव
रचितम्। अत्रास्यां संहितायां श्लोकानामनुष्टुप्छन्दसामूनचत्वारि सहस्राणि। एकोनचत्वारिंश-
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