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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 658, कुल 760 में से

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पृष्ठ 658

६३० बृहत्संहिता
तक विचरण करते हैं। तत्पश्चात् वह पुरुष दूसरे कल्प के आदि में बुद्धिमान चक्रवर्ती
राजा होता है और चक्रवर्तित्व नष्ट होने के पश्चात् संसार में जन्म लेकर राजा या
धनाढ्य ब्राह्मण होता है।।१३।।
इति 'विमला' हिन्दीटीकायां रूपसत्राध्यायः पञ्चाधिकशततमः ॥१०५॥
गगने नभसि नक्षत्राणामृक्षाणां माला पंक्तिर्यावद्विचरति तिष्ठति। इहास्मिन् लोके
भासा कान्त्या भूषयन्ती शोभामुत्पादयन्ती। तावत् पुरुषः स्त्री वा तैरेव नक्षत्रैः सह साकं
नक्षत्रभूतस्तारकरूपो विचरति तिष्ठति। ब्रह्मणः पितामहस्याह्नो दिनस्यावशेषं कल्पान्तं
यावत्। अन्यस्मिन् कल्पादौ पुनः कल्पप्रारम्भे चक्रवर्ती सार्वभौमो राजा मतिमान् पण्डितश्च
भवति। भूयः पुनस्तत्क्षयाच्चक्रवर्तित्वविनाशात् संसारे मनुष्यो जायमान उत्पद्यमानो नरपती
राजा भवति, अथवा ब्राह्मणो द्विजो धनाढ्यो बहुवित्तो भवति।।१३।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ रूपसत्रं
नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥१०५॥
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