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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 657, कुल 760 में से

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पृष्ठ 657

रूपसत्राध्यायः ६२९
यदि पूर्वोक्त व्रत को स्त्री करे तो शारदीय चन्द्र के समान मुखकान्ति, कमलदल के
समान नेत्र, सुन्दर दाँत, सुन्दर कान, भ्रमरोदर के समान केश, पुंस्कोकिल के समान
वाणी, ताम्र वर्ण के समान ओंठ, कमल के समान हाथ और पाँव, स्तनों के भार से नत
मध्य भाग, दक्षिणावर्त नाभियों से युत, केले के खम्भे के समान ऊरु, सुन्दर नितम्बकूप,
स्वामिप्रिया और मिली हुई अँगुलियों से युत पाँव वाली होती है। इसी तरह इस व्रत को
करने से पुरुष भी होता है॥१०-१२॥
शरदमलपूर्णचन्द्रेति। स्त्री कृतरूपसत्रव्रता कीदृशी भवति ? शरदमलपूर्णचन्द्र-
द्युतिसदृशमुखी, शरत्काले योऽसावमलो निर्मलः, पूर्णचन्द्रः शशी, तस्य द्युतिः कान्तिः।
तत्सदृशं मुखं वदनं यस्याः। सरोजदलनेत्रा पद्मपत्रसदृशाक्षी। रुचिरदशना सुशोभन-
शुक्लदन्ता। सुकर्णा शोभनकर्णा। केशैर्मूर्धजैर्भ्रमरोदरसन्निभैर्द्विरिफजठरकान्तिभिः। अतिनील-
वर्णैरित्यर्थः।
पुंस्कोकिलेति। पुंस्कोकिलस्य। पुमांश्चासौ कोकिलः पुंस्कोकिलः। प्रधानकोकिलस्य
समा तुल्या वाणी स्वरो यस्याः। ताम्रोष्ठी लोहितदन्तच्छदा। पद्मपत्रकरचरणा पद्मपत्राभौ
करौ हस्तौ चरणौ पादौ च यस्याः। स्तनभारानतमध्या, स्तनभारेण कुचयुगलोद्वहनेन
नतं विनतं मध्यं यस्याः। तथा नाभ्या प्रदक्षिणावर्तया संयुक्ता। प्रदक्षिणेनावर्तो यस्याः।
कदलीकाण्डनिभोरूः, कदली रम्भा तस्याः काण्डं शाखा, तन्निभो तत्सदृशावुरू
यस्याः। सुश्रोणी शोभनवराङ्गा, वरकुकुन्दरा, वरौ शोभनौ कुकुन्दरौ नितम्बरूपकौ यस्याः।
तथा च—
नितम्बरूपकौ यौ तु तौ कुकुन्दरसंज्ञितौ।
सुभगा सौभाग्योपेता। भर्तृवल्लभैत्यर्थः। सुश्लिष्टाङ्गुलिपादा। सुश्लिष्टाः संहिता
अङ्गुलयो ययोस्तादृशौ पादौ यस्याः। एवंविधा प्रमदा स्त्री। मनुष्यः पुरुषश्च भवति।
अथ रूपसत्राचरितस्य प्रशंसार्थमाह—
यावन्नक्षत्रमाला विचरति गगने भूषयन्तीह भासा
तावन्नक्षत्रभूतो विचरति सह तैर्ब्रह्मणोऽह्नोऽवशेषम्।
कल्पादौ चक्रवर्ती भवति हि मतिमांस्तत्क्षयाच्चापि भूयः
संसारे जायमानो भवति नरपतिर्ब्राह्मणो वा धनाढ्यः ॥१३॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां रूपसत्रं
नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥१०५॥
इस लोक में अपनी कान्ति से शोभा उत्पन्न करती हुई नक्षत्रमाला जब तक
आकाश में रहती है, तब तक स्त्री या पुरुष नक्षत्ररूप होकर नक्षत्रों के समान कल्पान्त
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