बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ रूपसत्राध्यायः
अथ रूपसत्रं व्याख्यायते। आदौ नक्षत्रपुरुषस्याङ्गविभागं तन्नक्षत्रावस्थितिं चाह—
पादौ मूलं जङ्घे च रोहिणी जानुनी तथाश्विन्यः।
ऊरू चाषाढाद्वयमथ गुह्यं फल्गुनीद्वितयम् ॥१॥
कटिरपि च कृत्तिका पार्श्वयोश्च यमला भवन्ति भद्रपदाः।
कुक्षिस्था रेवत्यो विज्ञेयमुरोऽनुराधा च ॥२॥
पृष्ठं विद्धि धनिष्ठां भुजौ विशाखा स्मृतौ करौ हस्तः।
अङ्गुल्यश्च पुनर्वसुराश्लेषासंज्ञिताश्च नखाः ॥३॥
ग्रीवा ज्येष्ठा श्रवणं श्रवणौ पुष्यो मुखं द्विजाः स्वातिः।
हसितं शतभिषगथ नासिका मघा मृगशिरो नेत्रे ॥४॥
चित्रा ललाटसंस्था शिरो भरन्यः शिरोरुहाश्चार्द्रा।
नक्षत्रपुरुषकोऽयं कर्तव्यो रूपमिच्छद्भिः ॥५॥
नक्षत्रपुरुष के दोनों पाँव में मूल, दोनों जङ्घाओं में रोहिणी, दोनों जानुओं में अश्विनी,
दोनों ऊरुओं में पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा, गुह्य (लिङ्ग और गुदा) में पूर्वफाल्गुनी और
उत्तरफाल्गुनी, कमर में कृत्तिका, दोनों पार्श्व में पूर्वभाद्रपदा और उत्तरभाद्रपदा, पेट में
रेवती, छाती में अनुराधा, पीठ में धनिष्ठा, दोनों भुजाओं में विशाखा, दोनों हाथों में
हस्त, अंगुलियों में पुनर्वसु, नखों में आश्लेषा, ग्रीवा में ज्येष्ठा, दोनों कानों में श्रवण,
मुख में पुष्य, दाँतों में स्वाति, हास्य में शतभिषा, नासिका में मघा, दोनों आँखों में
मृगशिरा, ललाट में चित्रा, शिर में भरणी तथा केशों में आर्द्रा को स्थापित करना चाहिये।
सुन्दर रूप की इच्छा करने वाले पुरुषों को यह नक्षत्रचक्र बनाना चाहिये ॥१-५॥
पादौ मूलमिति। नक्षत्रपुरुषस्य पादौ चरणौ मूलम्। एवं जङ्घे द्वे रोहिणी। जानुनी
तथाऽश्विन्यः। ऊरू द्वावाषाढाद्वयम्। पूर्वाषाढोत्तराषाढे। अथशब्दश्चार्थे। गुह्यं लिङ्गं गुदश्च
फल्गुनीद्वितयं पूर्वफल्गुन्युत्तरफल्गुनीति।
कटिरपि चेति। कृत्तिका कटिर्जघनम्। पार्श्वयोश्च यमला भद्रपदा भवन्ति। पूर्व-
भाद्रपदोत्तरभद्रपदौ। रेवत्यः कुक्षिस्थाः। अनुराधा उरो वक्षो विज्ञेयं ज्ञातव्यम्।
पृष्ठमिति। धनिष्ठां पृष्ठं विद्धि जानीहि। विशाखा भुजौ द्वौ स्मृतावुक्तौ। हस्तौ द्वौ
करौ हस्त एव। पुनर्वसुरङ्गुल्यः करशाखाः। आश्लेषासंज्ञिताश्च नखाः कररुहाः।
ग्रीवा ज्येष्ठेति। ग्रीवा शिरोधरा ज्येष्ठा। श्रवणं श्रवणौ द्वौ कर्णौ। पुष्यो मुखं
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