बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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न्यासः— ल
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अथ सुस्थितैर्ग्रहैः पुरुषस्य सुस्थितत्वमाह—
प्रकृत्यापि लघुर्र्यश्च वृत्तबाह्ये व्यवस्थितः ।
स याति गुरुतां लोके यदा स्युः सुस्थिता ग्रहाः ॥५८॥
जिस तरह स्वभाव से लघु अक्षर भी वृत्तबाह्य ( पादान्त ) में व्यवस्थित होने से
गुरु हो जाता है, उसी तरह जो पुरुष स्वभाव से लघु ( दूषित कुल में उत्पन्न ) और
वृत्तबाह्य ( बाह्येन्द्रिय ) में व्यवस्थित है अर्थात् दुःशील है, वह भी अनुकूल ग्रह आने
पर लोगों में पूजित होता है। यह अनुष्टुप् छन्द है॥५८॥
यः पुरुषः प्रकृत्या स्वभावेन लघुः स्वल्पोऽसत्कुलप्रसूतः । तथा वृत्तबाह्ये बाह्येन्द्रिये
व्यवस्थितो दुःशील इत्यर्थः। स तथाभूतोऽपि लोके गुरुतां पूज्यतां याति गच्छति। यदा
सुस्थिताः शोभनस्थानस्था अनुकूला ग्रहाः स्युर्भवेयुः। छन्दसां प्रस्तारे परिभाषेयम्—यो
वर्णः प्रकृत्यापि स्वभावत एव लघुरेकमात्रः। वृत्ताच्छन्दसो बाह्ये पादान्ते स्थितः स गुरुतां
गुरुत्वं द्विमात्रत्वं याति। यदा सुस्थिता ग्रहा गणाश्चतुर्मात्रादिकाः स्युः येन प्रस्तारदोषो नोत्पद्यते
तदा तस्य गुरुता कार्या, नान्यथेति। एकमात्रिक ऋजुरप्यन्ते वक्रो दीर्घो भवति। वृत्तमेतद्-
परमनुष्टुभं विन्द्यात्। एतदेवोदाहरणम्॥५८॥
असुस्थितैर्यत् कर्म क्रियते तत् कर्तुश्चोपघातं करोतीत्येतद्वैतालीयेनाह—
प्रारब्धमसुस्थितैर्ग्रहैर्यत् कर्मात्मविवृद्धये बुधैः ।
विनिहन्ति तदेव कर्म तान् वैतालीयमिवायथाकृतम् ॥५९॥
जिस तरह अविधान से वेताल-सिद्धि के लिये किया हुआ कर्म साधकों का ही
नाश करता है, उसी तरह पण्डित लोग असुस्थित ग्रहों के आने पर आत्मवृद्धि के लिये
जिस कर्म का प्रारम्भ करते हैं, वह कर्म ही उनका नाश करता है। यह वैतालीय छन्द
है॥५९॥
बुधैः पण्डितैः। यत् कर्म कार्यमात्मविवृद्धये आत्मनो वृद्ध्यर्थमसुस्थितैर्ग्रहैः प्रारब्ध-
माक्षिप्तम्।
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