बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहगोचराध्यायः ६१३
अथ ग्रहसंयोगाच्चन्द्रफलविशेषं वक्त्रेणाह—
यादृशेन ग्रहेणेन्दुर्युक्तस्तादृग्भवेत् सोऽपि।
मनोवृत्तिसमायोगाद्विकार इव वक्त्रस्य ॥५६॥
जिस तरह मनोवृत्ति के संयोग से मुख का विकार मनोवृत्ति के समान होता है,
अर्थात् प्रसन्न मन रहने से प्रसन्न मुख और दुःखित मन रहने से उदास मुख रहता है,
उसी तरह यादृश शुभाशुभ ग्रह से युक्त चन्द्र होता है, तादृश शुभाशुभ फल करता है।
अर्थात् शुभ ग्रह से युत चन्द्र शुभ फल और पापग्रह से युत चन्द्र पापफल करता है।
यह वक्त्र छन्द है॥५६॥
इन्दुश्चन्द्रमा यादृशेन ग्रहेण शुभेन वाऽशुभेन युक्तस्तादृशः सोऽपि भवति। पापयुतः
पापफलः, सौम्ययुतः शुभफल इत्यर्थः। मनोवृत्तिसमायोगाद्धेतोः। यतश्चन्द्रो मनः, उक्तं
च—‘मनस्तुहिनगुः’ इति। मनसो येन सह संयोगास्तादृगेव तदपि भवति। यथा मनोवृत्ति-
समायो