बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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उपगीति की मात्राओं के गण की तरह या साधुओं के समागम की तरह बुध राशि
के आदि और अन्त में समान फल देता है। अर्थात् जैसे उपगीति छन्द में दोनों अर्ध
तुल्य लक्षण-लक्षित होते हैं तथा जैसे साधुओं का समागम सदा एक-सा रहता है,
उसी तरह बुध राशि के आदि और अन्त में तुल्य फल देता है। यह उपगीति छन्द
है।।५०।।
आदौ राशिप्रवेशकाले यादृक् शुभो वाऽशुभः सौम्यो बुधो भवति तादृशः पश्चाद्रा-
श्यन्तेऽपि। यत उक्तम्—
शशितनयः फलदस्तु सर्वकालम्। इति।
एवं राश्याद्यन्तयोस्तुल्यफलमुपगीतिमात्राणां गणवत्। उपगीतिरार्या। तस्या मात्राणां
ये गणाश्चतुर्भागास्तेषां यथाऽऽद्यन्तयोः समता तथा बुधस्य। अथवा यथा सत्सम्प्रयोगः
सतां साधूनां सम्प्रयोगः समागमः। यादृगादौ भवति तादृगन्ते न कदाचिद्विरूपता। उपगीति-
वृत्तमिदम्।
आर्याद्वितीयदलेत्याद्यस्या लक्षणम्। न्यासः प्रसिद्धः।।५०।।
अधुना जीवगोचरफलस्योपदेशनायार्यालक्षणमाह—
आर्याणामपि कुरुते विनाशमन्तर्गुरुर्विषमसंस्थः।
गण इव षष्ठे दृष्टः स सर्वलघुतां जनं नयति ।।५१।।
जिस तरह विषम गण में स्थित अन्तर्गुरु वाला ( मध्य गुरु वाला = जगण ) आर्या
छन्द का और विषम स्थित ( अप्रसन्न ) गण ( देवताविशेष ) उत्तम पुरुषों का भी नाश
करता है, उसी तरह विषम स्थित गुरु राशि के मध्य भाग में उत्तम पुरुषों का भी नाश
करता है तथा जैसे आर्या छन्द के षष्ठ गण में स्थित जगण सर्वलघुत्व ( चारो लघुता )
को प्राप्त होता है, उसी तरह षष्ठ राशिस्थ गुरु जन को सर्वलघुत्व ( लोगों में गौरवहीन )
करता है। यह आर्या छन्द है।।५१।।
आर्याणां साधूनामपि गुरुर्जीवो विषमसंस्थोऽन्तर्मध्ये मध्यमराशौ मध्यभागे प्राप्तो
विनाशं करोति, अशुभं फलं विदधाति। शुक्लोऽप्येवमेव वेदितव्यो गुरुग्रहणात्। यतः
सोऽपि राशेर्मध्ये फलं ददाति। उक्तं च—
'गुरुभृगुजौ भवनस्य मध्ययातौ' इति।
यथा गणो देवविशेषो यात्रायां गणयोगविधावुक्तः—'अनर्चितास्ते नृपतिं सवाहनं
विनाशयन्ति' इत्यादि। स गणो विषमस्थोऽप्रसन्नः। आर्याणामपि विनाशं करोति। तद्वदिति।
स एव गुरुः षष्ठे स्थाने गतो दृष्टः। जन्मराशेः षष्ठस्थानप्राप्तौ विलोकितश्च जनं पुरुषं
सर्वलघुतां सर्वत्राल्पतां नयति। स पुरुषः सर्वत्र गौरवरहितो भवतीत्यर्थः। अथ द्वितीयोऽर्थो
व्याख्यायते—आर्यावृत्तविशेषः। आर्याणामन्तर्गुरुर्जगणो दृष्टस्तत्र भवति। अथ तस्या
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