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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 630, कुल 760 में से

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पृष्ठ 630

६०२ बृहत्संहिता
तल्लक्षणम्—
स्याद्भरना रनौ च गुरु नाम सात्र ललिता।
भ आदिगुरुः। रलमध्यः। नस्त्रिलघुः। पुना रेफनकारौ। अन्ते गुरुः। सा वृत्तजातिः।
अत्रास्मिन् छन्दसि ललिता नाम स्याद् भवेत्॥४१॥
न्यासः— भ र न र न गु
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अथ चतुर्थस्य सौरस्य फलं भुजङ्गप्रयातेनाह—
चतुर्थं गृहं सूर्यपुत्रेऽभ्युपेते सुहृद्वित्तभार्यादिभिर्विप्रयुक्तः।
भवत्यस्य सर्वत्र चासाधु दुष्टं भुजङ्गप्रयातानुकारञ्च चित्तम्॥४२॥
जिसके चतुर्थ गृह में शनि हो, वह मित्र, धन, स्त्री आदि (पुत्र और बन्धु) से
रहित होता है तथा उसका चित्त सर्वत्र असाधु, दुष्ट और भुजङ्ग (सर्प) के प्रयात
(गमन) का अनुकरण करने वाला (अति कुटिल) होता है। यह भुजङ्गप्रयात छन्द
है॥४२॥
सूर्यपुत्रे सौरे चतुर्थगृहं वेदस्थानमभ्युपेते प्राप्ते। सुहृद्भिर्मित्रैः। वित्तेन धनेन। भार्यया
स्त्रिया। आदिग्रहणात् पुत्रैर्बन्धुभिश्च। एतैर्विप्रयुक्तो रहितो भवति। अस्य नरस्य चित्तं मनः।
सर्वत्र सर्वस्मिन्नेव। असाध्वशोभनम्। दुष्टं पापादिष्वनुरतम्। भुजङ्गप्रयातानुकारं च भवति।
भुजङ्गस्य सर्पस्य प्रयातं गमनमनुकरोति। अतिकुटिलचित्तो भवतीत्यर्थः। वृत्तमेतद् भुजङ्ग-
प्रयातम्। तल्लक्षणम्—
भुजङ्गप्रयातं चतुर्भिर्यकारैः।
य आदिलघुः। चतुर्भिर्यकारैर्भुजङ्गप्रयातं भवति॥४२॥
न्यासः— य य य य
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अथ पञ्चमषष्ठस्थस्य सौरस्य फलं पुटयाऽऽह—
सुतधनपरिहीणः पञ्चमस्थे प्रचुरकलहयुक्तश्चार्कपुत्रे।
विनिहतरिपुरोगः षष्ठयाते पिबति च वनितास्यं श्रीपुटोष्ठम्॥४३॥
जिसके पञ्चम राशिगत शनि हो वह पुत्र तथा धनों से रहित और कलहों से युत
होता है। षष्ठ राशिगत शनि हो तो शत्रुरहित, नीरोग और सुन्दर ओठों से युत स्त्री के मुख
का पान करने वाला होता है। यह पुटा छन्द है॥४३॥
अर्कपुत्रे शनैश्चरे। पञ्चमस्थे सुतस्थानप्राप्ते। सुतैः पुत्रैः। धनैर्वित्तैश्च परिहीणो रहितः।
प्रचुरेण प्रभूतेन कलहेन विरोधेन च युक्तः। षष्ठयाते षष्ठस्थानस्थे विनिहतरिपुरोगः, विनिहता
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