बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहगोचराध्यायः ६०१
अन्यगुणैः कृतं वसुचयं तदपि खलु भव-
त्यम्ब्विव वंशपत्रपतितं न बहु न च चिरम् ॥४०॥
जिस मनुष्य के चारवश जन्मराशि से द्वितीय राशि में शनि हो, वह रूप तथा सुख
से रहित शरीर वाला, अहंकाररहित और निर्बल होता है। अन्य विद्या आदि गुणों से धन
को इकट्ठा करने पर भी वंशपत्र पर पतित जलबिन्दु की तरह वह पर्याप्त नहीं होता और
चिरकाल तक नहीं ठहरता। यह वंशपत्रपतित छन्द है॥४०॥
दिनकरतनये शनैश्चरे। चारवशाच्चारक्रमेण। द्वितीयगृहे द्वितीयस्थानगते। रूपसुखा-
पवर्जिततनुः, रूपेण सुवेषेण सुखेन चापवर्जिता तनुः शरीरं यस्य सः। तथा विगतमदबलः,
विगतं नष्टं मदो दर्प बलं वीर्यं च यस्य। अन्यगुणैरपरैर्विद्यादिकैर्गुणैः कृतमर्जितं वसुचयं
धनसमूहो यदि भवति तदपि खलु न बहु प्रभूतं पर्याप्तम् न च चिरं चिरकालं भवति।
खलुशब्दः समुच्चये