बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहगोचराध्यायः ५९७
संसेवते कुसुमरत्नविभूषितश्च
कामं वसन्ततिलकद्युतिमूर्धजोऽपि ॥३३॥
यदि द्वितीय राशि में शुक्र हो तो सन्तान, धन, धान्य, राजप्रियता और बन्धुओं से
हित कार्यों को प्राप्त करके पुष्प और रत्नों से विभूषित होकर वसन्ततिलका वृक्ष के
पुष्पसमान अति श्वेत बाल होने पर भी कामदेव की सेवा करता है। यह वसन्ततिलका
छन्द है॥३३॥
शुक्रे द्वितीयगृहगे द्वितीयस्थानस्थे। प्रसवोऽपत्यम्। अर्थो धनम्। धान्यं शालयः।
भूपालसन्नतः। भूपालो राजा सन्नतः सम्यग् नतः प्रह्वो भवति। राजवाल्लभ्यम्। कुटुम्बेभ्यो
हितम्। एतान्यवाप्य प्राप्य। कुसुमैः पुष्पैः। रत्नैर्मणिभिश्च। विभूषितोऽलङ्कृतः। कामं
मैथुनं संसेवते। कीदृशः? वसन्ततिलकद्युतिमूर्धजोऽपि, वसन्ततिलको वृक्षस्तस्य पुष्पमतीव
श्वेतवर्णं भवति। वसन्ततिलकसदृशी द्युतिः कान्तिर्मूर्धजेषु यस्य। अनभिप्रेतकामोऽपि
कामं संसेवते। जरादितोऽपि स्त्रीष्वनुरतो भवतीत्यर्थः। वृत्तमेतद्वसन्ततिलकम्। तल्लक्षणम्—
न्द्वौ जौ वसन्ततिलकं गुरुद्वयं चेत्।
तोऽन्तलघुः। भ आदिगुरुः। जो गुरुमध्यः। जकारद्वयम्। अन्ते गुरुद्वयम्॥३३॥
न्यासः— त भ ज ज गु
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अथ तृतीयचतुर्थस्थस्य शुक्रस्य फलमिन्द्रवज्रयाऽऽह—
आज्ञार्थमानास्पदभूतिवस्त्रशत्रुक्षयान् दैत्यगुरुस्तृतीये।
दत्ते चतुर्थश्च सुहृत्समाजं रुद्रेन्द्रवज्रप्रतिमाञ्च शक्तिम् ॥३४॥
तृतीय राशिगत शुक्र प्रभुत्व, धन, मान, स्थान, समृद्धि, वस्त्र और शत्रु का नाश
करता है। चतुर्थ राशिगत शुक्र मित्रों के साथ समागम तथा शिव, इन्द्र और वज्र की
तरह शक्ति करता है। यह इन्द्रवज्रा छन्द है॥३४॥
दैत्यगुरुः शुक्रः। तृतीये स्थाने आज्ञां प्रभुत्वम्। अर्थं धनम्। मानं पूजाम्। आस्पदं
स्थानम्। भूतिं समृद्धिम्। वस्त्रमम्बरम्। शत्रुक्षयं रिपुविनाशम्। दत्ते ददाति। चतुर्थश्चतुर्थ-
स्थानस्थश्च। सुहृद्भिर्मित्रैः समाजं संयोगम्। तथा रुद्रप्रतिमां महेश्वरतुल्यामिन्द्रप्रतिमां शक्र-
तुल्यां वज्रप्रतिमां कुलिशप्रतिमां शक्तिं सामर्थ्यं च ददाति। वृत्तमेतदिन्द्रवज्रा। तल्लक्षणम्—
तौ जौ गुरू चेद्भवतीन्द्रवज्रा।
तोऽन्तलघुः। द्वौ तकारौ। जो गुरुमध्यः। अन्ते गुरुद्वयम्॥३४॥
न्यासः— त त ज गु
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