बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ बृहत्संहिता
चतुरस्रे चतुःषष्टिपदो वास्तुनरः
ई -------------------------------- पू -------------------------------- आ
| शिखी / दितिः | पर्जन्यः | जयन्तः | इन्द्रः | सूर्यः | सत्यः | भृशः | अन्तरिक्षः / अनिलः |
| अदितिः | पर्जन्यः / अदितिः | जयन्तः | इन्द्रः | सूर्यः | सत्यः | भृशः / पूषा | पूषा |
| भुजगः | भुजगः | आपवत्सः / आपः | अर्यमा | अर्यमा | सविता / सावित्रः | वितथः | वितथः |
| सोमः | सोमः | पृथिवीधरः | ब्रह्मा | ब्रह्मा | विवश्वान् | बृहक्षतः | बृहक्षतः |
उ | भल्लाटः | भल्लाटः | पृथिवीधरः | ब्रह्मा | ब्रह्मा | विवश्वान् | यमः | यमः | द
| मुख्यः | मुख्यः | रुद्रः / राजयक्ष्मा | मित्रः | मित्रः | इन्द्रः / जयः | गन्धर्वः | गन्धर्वः |
| नागः | नागः / शोषः | असुरः | वरुणः | कुसुमदन्तः | सुग्रीवः | भृङ्गराजः / दौवारिकः | भृङ्गराजः |
| रोगः / पापयक्ष्मा | शोषः | असुरः | वरुणः | कुसुमदन्तः | सुग्रीवः | दौवारिकः | मृगः / पिता |
वा -------------------------------- प -------------------------------- नै
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