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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 614

५८६ बृहत्संहिता
अथ सप्तमाष्टमनवमस्थस्य भौमस्य फलं विलम्बितगतिनाह—
कलत्रकलहाक्षिरुग्जठररोगकृत् सप्तमे
क्षरत्क्षतजरूक्षितः क्षपितवित्तमानोऽष्टमे ।
कुजे नवमसंस्थिते परिभवार्थनाशादिभि-
र्विलम्बितगतिर्भवत्यबलदेहधातुक्लमैः ॥१६॥
यदि जन्मराशि से सप्तम स्थान में मंगल हो तो स्त्री के साथ विरोध, नेत्ररोग और
उदररोग होता है। अष्टम में हो तो निकलते हुये रुधिर से विवर्ण शरीर, धन और मान का
नाश करता है। जिसके नवम में मंगल हो वह पराभव, अर्थनाश आदि से शरीर में
निर्बलता और धातुओं के क्षय से मन्दगति वाला हो जाता है। यह विलम्बितगति छन्द
है।।१६।।
कलत्रकलहाक्षिरुगिति । कुजे भौमे सप्तमे कलत्रं भार्या तेन सह कलहो विरोधः ।
अक्षिरुक् चक्षुष्पीडा। जठररोग उदररोगः। एतान् करोति। क्षरत्क्षतजरूक्षित इति ।
अष्टमे अष्टमस्थे भौमे। क्षरत् स्रवत् क्षतजं रक्तं तेन रूक्षितो विवर्णीकृतः । क्षपितवित्तमानः ।
वित्तं धनं मानं पूजा ते क्षपिते नष्टे यस्य। कुजे नवमसंस्थित इति । कुजे भौमे नवम-
स्थानस्थे परिभवैरभिभवनैः। अर्थनाशैर्वित्तक्षयैः। आदिग्रहणात् पीडाभिः। एवमादिभिर्दोषैः।
तथा अबलत्वेन निष्प्रामाण्यत्वेन देहस्य शरीरस्य। तथा धातूनां क्लमेन ग्लानत्वेन।
वसासृग्मांसमेधोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः।
एतैर्विलम्बितगतिर्भवति। विलम्बिता विघ्निता गतिर्गमनं यस्य। अशक्तित्वात्।
वृत्तमिदं विलम्बितगतिः। तल्लक्षणम्—
विलम्बितगतिर्जसौ जसयलैर्युतैर्भवेत्।
जो गुरुमध्यगतः। सोऽन्तगुरुः। पुनरपि जकारसकारौ। यकार आदिलघुः। अन्ते लघु-
गुरू। एतैर्विलम्बितगतिः ।।१६।।
न्यासः— ज स ज स य ल गु
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अथ दशमैकादशस्थस्य कुजस्य फलं पुष्पिताग्रयाऽऽह—
दशमगृहगते समं महीजे विविधधनाप्तिरुपान्त्यगे जयश्च ।
जनपदमुपरि स्थितश्च भुङ्क्ते वनमिव षट्चरणः सुपुष्पिताग्रम् ॥१७॥
यदि जन्मराशि से दशम स्थान में मंगल हो तो मध्यम फल और एकादश में हो तो
अनेक प्रकार के धन की प्राप्ति और जय होती है तथा पुष्पित अग्रभाग वाले वृक्षों से
युत वन में भ्रमर की तरह लोगों में प्रधान होकर भोग करता है। यह सुपुष्पिताग्र छन्द
है।।१७।।
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