बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनक्षत्रजातकाध्यायः ५५७
क्षयवृद्धिभावनायां यशांसि विदिशो भवन्ति कृच्छ्राणि।
व्याधिबहुलो बहुसुतः पुनर्वसौ जायते मनुजः॥ इति॥४॥
अथ तिष्याश्लेषयोर्जातस्य स्वरूपमाह—
शान्तात्मा सुभगः पण्डितो धनी धर्मसंश्रितः पुष्ये।
शठसर्वभक्ष्यपापः कृतघ्नधूर्तश्च भौजङ्गे ॥५॥
पुष्य नक्षत्र में उत्पन्न जातक शान्त प्रकृति वाला, सबों का प्रिय, पण्डित, धनी और
धर्म से युत होता है। आश्लेषा में उत्पन्न जातक शठ, खाद्य और अखाद्य सबों को खाने
वाला, पापी, अन्य के कृत्यों को नाश करने वाला एवं धूर्त होता है॥५॥
शान्तात्मा जितेन्द्रियः। सुभगः सर्वजनप्रियः। पण्डितः शास्त्रवित्। धनी वित्तवान्।
धर्मसंश्रितो धार्मिकः। एवंविधः पुष्ये जातो भवति। तथा च पराशरः—
द्युतिकान्तिसत्त्वयुक्तो बहुश्रुतो दारदासधनचेष्टः।
विपुलकुलवंशकर्ता व