बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 576, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ें५४८ बृहत्संहिता
अथैतैर्यत् कर्तव्यं तदाह—
कुर्याद्ववे शुभचरस्थिरपौष्टिकानि
धर्मक्रियाद्विजहितानि च वालवाख्ये।
सम्प्रीतिमित्रवरणानि च कौलवे स्युः
सौभाग्यसंश्रयगृहाणि च तैतिलाख्ये ॥३॥
कृषीबीजगृहाश्रयजानि गरे वणिजि ध्रुवकार्यवणिग्युतयः ।
न हि विष्टिकृतं विदधाति शुभं परघातविषादिषु सिद्धिकरम् ॥४॥
वव करण में शुभ ( धर्म आदि ), चर ( अल्प समय में होने वाला ), स्थिर ( बहुत
देर तक ठहरने वाला ) और पुष्टि ( शरीर-पुष्टिकारक ) कार्य करना शुभ होता है।
वालव करण में धर्मक्रिया और ब्राह्मणों के हित का कार्य करना शुभ है। कौलव करण
में प्रीति ( किसी के साथ स्नेह ), मित्र और वरण ( कन्यावरण ) करना शुभ है। तैतिल
करण में सौभाग्य ( जिस कार्य को करने से सबका प्रिय हो ), संश्रय और गृहसम्बन्धी
कार्य करना शुभ है। गर करण में खेती, बीज और आश्रमसम्बन्धी कार्य करना शुभ है।
वणिज करण में स्थिर कार्य, वाणिज्य और युतिं ( किसी के साथ संयोग ) सम्बन्धी
कार्य करना शुभ है। विष्टि करण में किया हुआ कोई भी कार्य शुभ नहीं होता है; किन्तु
केवल शत्रुओं का नाश, विष आदि का प्रयोग और अग्निदाह आदि कार्य करना शुभ
है॥३-४॥
कुर्याद्वव इति । वत्रे ववाख्ये करणे। शुभानि प्रशस्तानि यानि धर्मादीनि कार्याणि।
तथा चराणि स्वल्पकालसाध्यानि क्षिप्रोपयोगीनि। स्थिराणि कालान्तरस्थायीनि। तथा
पौष्टिकानि शरीरपुष्टिं यानि जनयन्ति। तानि कुर्यात्। वालवाख्ये धर्मक्रिया धर्मसमायुक्ताः
क्रियाः। तथा द्विजानां ब्राह्मणानां च हितान्यनुकूलानि कार्याणि। सम्प्रीतिः केनचित् स्नेहः।
मित्रं सुहृत्। वरणं कन्यावरणम्। एतानि च कार्याणि कौलवे स्युर्भवेयुः। सौभाग्यं सुभगत्वं
येन कर्मणा सर्वजनवाल्लभ्यं भवति तत्सौभाग्यम्। संश्रयः कश्चित् पधानजन· संश्लिष्यते।
गृहं भवनम्। एतानि तैतिलाख्ये कार्याणि।
कृषिबीजेति । कृषिः कर्षणम्। बीजानि प्रसिद्धानि यान्युप्यन्ते। गृहाश्रयजम्। गृहं
वेश्म आश्रित्य यज्जायत उत्पद्यते। एतानि सर्वाणि गरे कार्याणि। ध्रुवाणि स्थिराणि
यानि कार्याणि। वणिग् वाणिज्यम्। युतिः केनचित् सह संयोगः। एतान्येव वणिजि
कार्याणि। विष्टिकृतं न हि शुभं श्रेयस्करं फलं विदधाति करोति; केवलं पराणां शत्रूणां
घाते निपाते विषादिषु विषप्रयोगेऽग्निदाहादौ च सिद्धिकरम्॥३-४॥
तथा स्थिरकरणैर्यत् कर्तव्यं तदाह—
कार्यं पौष्टिकमौषधादि शकुनौ मूलानि मन्त्रास्तथा
गोकार्याणि चतुष्पदे द्विजपितॄनुद्दिश्य राज्यानि च।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA