बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१२ बृहत्संहिता
द्वितीय अक्षर खकार, सप्तम राशि ( वृश्चिक ) में प्रथम नवांशाधिपति चन्द्र के वर्ग का
चतुर्थ अक्षर वकार, दशम राशि ( कुम्भ ) में प्रथम नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का
द्वितीय अक्षर छकार आता है। इस तरह स्थिरसंज्ञक राशियों के प्रथम नवांश में वर्णों का
विन्यास करना चाहिये।।२०।।
स्थिरसंज्ञा वृषसिंहवृश्चिककुम्भाः। ते च यथासङ्ख्यं मकरमेषकर्कटतुलेभ्य उदयं यान्ति।
वृषस्य प्रथमनवांशको मकरस्तत्स्वामी सौरस्तदीयद्वितीयमक्षरं फकारमापतति। सिंहस्य
प्रथमनवांशको मेषस्तत्स्वामी भौमस्तदीयाद्वर्गाद् द्वितीयमक्षरं खकारमापतति। वृश्चिकस्य
प्रथमनवांशकः कर्को तस्य स्वामी चन्द्रस्तदीयाद्यवर्गाच्चतुर्थमक्षरं वकारमापतति। कुम्भस्य
प्रथमनवांशकस्तुलस्तत्स्वामी शुक्रस्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं छकारमापतति। अत एवोक्तम्—
वृषे फकारो हिबुके खकारः कीटे वकारो नृघटे छकारः।
एवं स्थिरसंज्ञकेषु स्थिरराशिषु मतिमान् पण्डित आद्यांशकेषु प्रथमनवांशकेष्वनुक्रमेण
परिपाट्या विदध्यात् कारयेत्।।२०।।
अथान्येष्वाह—
लग्ने बकारो हिबुके जकार ईकारमस्तेऽम्बरगे गकारः।
वृषे थकारो हिबुके टकारः कीटे डकारो नृघटे दकारः ।।२१।।
वृष लग्न में द्वितीय नवांश हो तो वृष में द्वितीय नवांशाधिपति शनि के वर्ग का
तृतीय अक्षर वकार, चतुर्थ राशि ( सिंह ) में द्वितीय नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का
तृतीय अक्षर जकार, सप्तम राशि ( वृश्चिक ) में द्वितीय नवांशाधिपति सूर्य के वर्ग का
चतुर्थ अक्षर ईकार और दशम राशि ( कुम्भ ) में द्वितीय नवांशाधिपति मंगल के वर्ग
का तृतीय अक्षर गकार आता है। वृष लग्न में तृतीय नवांश हो तो वृष में तृतीय नवांशा-
धिपति गुरु के वर्ग का द्वितीय अक्षर थकार, चतुर्थ राशि ( सिंह ) में तृतीय नवांशाधिपति
बुध के वर्ग का प्रथम अक्षर टकार, सप्तम राशि ( वृश्चिक ) में तृतीय नवांशाधिपति
बुध के वर्ग का प्रथम अक्षर डकार और दशम राशि ( कुम्भ ) में तृतीय नवांशाधिपति
बृहस्पति के वर्ग का तृतीय अक्षर दकार आता है।।२१।।
वृषद्वितीयनवांशकस्य सौरः स्वामी तदीयवर्गात् तृतीयमक्षरं बकारमापतति। सिंह-
द्वितीयनवांशकस्य स्वामी शुक्रस्तदीयवर्गात् तृतीयमक्षरं जकारमापतति। वृश्चिकद्वितीय-
नवांशकस्य स्वामी सूर्यस्तदीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरमीकारमापतति। कुम्भस्य द्वितीयनवांशकस्वामी
भौमस्तदीयवर्गात् तृतीयमक्षरं गकारमापतति। अत एवोक्तम्—
लग्ने बकारो हिबुके जकार ईकारमस्तेऽम्बरगे गकारः।
वृषतृतीयनवांशकस्वामी जीवस्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं थकारमापतति। सिंहस्य
तृतीयनवांशकस्वामी बुधस्तद्वर्गात् प्रथममक्षरं टकारमापतति। वृश्चिकस्य तृतीयनवांशकस्वामी
बुधस्तदीयवर्गात् तृतीयमक्षरं डकारमापतति। कुम्भस्य तृतीयनवांशकस्वामी जीवस्तदीयवर्गात्