बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०८ बृहत्संहिता
प्रथमो लभ्यते, दृष्टिबलेन द्वितीयादयः । एवं बुद्ध्वा ततोऽक्षराणां वर्णानामनुपूर्व्योगः ।
अनुपूर्वेण अनुक्रमेण योगः संयोगः कार्यः कर्तव्यः । तथा मात्रादिसंयोगविकल्पना च कार्या ।
मात्रा आदिर्यस्य स मात्रादिसंयोगस्तस्य विकल्पना संयोगविकल्पना आदिसंयोगोऽन्तसंयोगश्च ।
एतदुक्तं भवति—अधोमात्रा ऊर्ध्वमात्रास्तिर्यङ्मात्राश्च संयोगविकल्पनया कार्याः ।।१३।।
अथांशकक्रमेण राशीनामक्षराण्याह—
तत्रादिराश्यादिचतुर्विलग्नमाद्यंशकादिक्रमपर्ययेण ।
ग्रहांशकेभ्यः स्वगणाक्षराणामन्वर्थने प्राप्तिरियं विधार्या ।।१४।।
वहाँ प्रथम लग्नराशि, फिर उससे चतुर्थ राशि आदि के प्रथम नवांश आदि क्रम से
नवांशाधिपति ग्रहों के अपने-अपने वर्गाक्षरों के संयोजन में यह निष्पत्ति करनी चाहिये।
अग्रिम पद्य से इसका अर्थ स्पष्ट होता है।।१४।।
तत्र तस्मिन्नामानयने । आदिराश्यादि । आदिराशिर्मेषस्तदादि तत्प्रथमं यच्चतुर्विलग्नं
मेषकर्कितुलामकराख्यं तस्याद्यंशकादिक्रमपर्ययेण, प्रथमनवांशकपरिपाट्या ग्रहांशकेभ्यो
नवग्रहभागेभ्यः स्वगणाक्षराणां स्ववर्गकथितवर्णानां ‘कवर्गपूर्वान् कुजशुक्रचान्द्रिजीवार्क-
जानाम्’ इत्यनेन विहितानामन्वर्थने प्राप्तिर्निष्पत्तिरियं विधार्या कर्तव्या।।१४।।
अथादिराश्यादिक्रमेण वर्णानाह—
मेषे ककारो हिबुके यकारस्तुले चकारो मकरे पकारः ।
मेषे छकारो हिबुकेऽप्यकारस्तुले खकारो मकरे फकारः ।।१५।।
जैसे कि लग्न में मेष राशि और प्रथम नवांश हो तो उससे चतुर्थ-चतुर्थ क्रम से
मेष, कर्क, तुला और मकर राशियाँ हुईं। मेष में प्रथम नवांश का स्वामी मंगल होता है।
उसके वर्ग का प्रथम अक्षर ककार आता है। चतुर्थ राशि ( कर्क ) का प्रथम नवांश
स्वामी चन्द्र है, उसके वर्ग का प्रथम अक्षर यकार आता है। सप्तम राशि ( तुला ) का
स्वामी शुक्र है, उसके वर्ग का प्रथम अक्षर चकार आता है और दशम राशि ( मकर )
का स्वामी शनि है, उसके वर्ग का प्रथम अक्षर पकार आता है। यदि मेष राशि के लग्न
में द्वितीय नवांश हो तो मेष राशि में द्वितीय नवांश-स्वामी शुक्र के वर्ग का द्वितीय अक्षर
छकार, चतुर्थ राशि ( कर्क ) में द्वितीय नवांश-स्वामी सूर्य के वर्ग का प्रथम अक्षर
अकार, सप्तम राशि तुला में द्वितीय-नवांश स्वामी मंगल के वर्ग का द्वितीय अक्षर
खकार और दशम राशि ( मकर ) में द्वितीय नवांश-स्वामी शनि के वर्ग का द्वितीय
अक्षर फकार आता है।।१५।।
मेषे लग्ने केन्द्रस्था मेषकर्कितुलमकरा भवन्ति। एत एव स्वांशेनोदयं कुर्वन्ति।
तत्र मेषस्य प्रथमो नवांशो मेष एव तस्य स्वामी भौमः। मेषस्य प्रथमनवांशकत्वाद्वौमवर्गात्
प्रथममक्षरं ककारमापतति। हिबुके चतुर्थे कर्कटकस्तस्य स्वामी चन्द्रः, तस्यापि प्रथमन-
वांशकोदयत्वाच्चन्द्राद्यवर्गात् प्रथमं वर्गाक्षरं यकारमापपति। सप्तमस्थाने तुलो भवति।