सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 535

शाकुनोत्तराध्यायः ५०७
अन्यद्विशेषमाह—
शुभग्रहस्तूर्जितवीर्यभागी स्थानांशतुल्याक्षरदः स चोक्तः।
पश्यन् स्थितः केन्द्रत्रिकोणयोर्वा स्वोच्चेऽपि वर्णद्वयमात्मभागे ॥११॥
अत्यन्त वीर्यशाली शुभ ग्रह जिस राशि के जितने संख्यक नवांश पर स्थित हो,
तत्तुल्य अक्षरों को देता है। वही अत्यन्त बलशाली शुभ ग्रह केन्द्र, त्रिकोण, अपने उच्च
या अपने नवांश में स्थित होकर देखा जाता हो तो दो अक्षर देता है॥११॥
शुभग्रहः सौम्यः। तुशब्दः समुच्चये। स चोर्जितमतीव वीर्य भजति तच्छीलः। ऊर्जित-
वीर्यभागी। स च स्थानांशतुल्याक्षरदः। यस्मिन् स्थाने यावत्संख्यांशे नवभागे स्थित-
स्तत्तुल्याक्षराणि ददाति। एवं तत्तुल्याक्षरद उक्तः कथितः। पश्यन् स्थित इति। अथवा
स एव शुभग्रह ऊर्जितवीर्यभागी केन्द्रेषु त्रिकोणयोर्नवपञ्चमयोर्वा स्थितः पश्यन्नवलोकयन्।
स्वोच्चे आत्मीयोच्चराशौ वा स्थितः पश्यन्नात्मभागे स्वे नवांशके स्थितः पश्यन् वर्णद्वय-
मक्षरद्वयमपि ददाति। अपिशब्दो विकल्पार्थः॥११॥
अन्यद्विशेषमाह—
क्षेत्रेश्वरे क्षीणबलेऽशके च मात्राक्षरं नाशमुपैति तज्जम्।
असम्भवेऽप्युद्भवमेति तस्मिन् वर्गाद्यमुच्चांशयुजीशदृष्टे ॥१२॥
लग्न का स्वामी और नवांश बलहीन हो तो उस उत्पन्न मात्राक्षर का नाश होता है।
यदि वही लग्नस्वामी और नवांश असम्भव (बलहीन का असम्भव अर्थात् बली) हो
और उच्चस्थित नवांशस्वामी से देखा जाता हो तो मात्राक्षर की उत्पत्ति होती है॥१२॥
क्षेत्रेश्वरे लग्नस्वामिनि क्षीणबले परिक्षीणवीर्ये क्षीणांशके क्षीणनवभागे तज्जं मात्राक्षरं
नाशमुपैति। मात्रा चाक्षरं च तन्मात्राक्षरम्। तस्माज्जातम् उत्पन्नं तज्जम्। नाशमुपैति क्षयं
प्राप्नोति। असम्भवेऽपीति। तस्मिन्नेव क्षीणेश्वरे क्षीणबलांशके चासम्भवे तस्य मात्राक्षरस्य
नाश उद्भवमेत्युद्भूतिमेति लभते। किं वर्गाद्यं वर्गप्रथमम्, तस्मिन्। कीदृशे? उच्चांशयुजि
उच्चस्थे तथेशदृष्टे स्वामिनावलोकिते॥१२॥
अनिश्चयीकरणमाह—
केन्द्रे यथास्थानबलप्रकर्षं क्षेत्रस्य तत्क्षेत्रपतेश्च बुद्ध्वा।
कार्योऽक्षराणामनुपूर्वयोगो मात्रादिसंयोगविकल्पना च ॥१३॥
केन्द्र में तथा राशि और राशिपति का स्थान और बल की उत्कृष्टता को जान कर
अक्षरों का आनुपूर्वीक संयोग करना चाहिये। साथ ही मात्रा आदि के संयोग की भी
कल्पना करनी चाहिये॥१३॥
केन्द्रे लग्नचतुर्थसप्तमदशमानामन्यतमे। क्षेत्रस्य राशेः। तत्क्षेत्रपतेश्च तत्स्वामिनः।
यथास्थानबलप्रकर्षम्, स्थानं च बलं च स्थानबले तयोः प्रकर्ष उत्कृष्टता। स्थानबलेन
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA