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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 527

शाकुनोत्तराध्यायः ४९९
सम्प्रयोगः, पुंराश्यादिषु वर्गे मिश्रे स्थिते पुरुषराशिवर्गे लग्ने समायां तिथौ व्यत्यये वा।
विदिक्स्थितः पुरुषः शकुनो विदिक्स्थितः स्त्रीसंज्ञो वा तदा पण्डकसम्प्रयोगो नपुंसकेन
सह समयोगो भवति।।९।।
पुनरप्याह—
एवं रवेः क्षेत्रनवांशलग्ने लग्ने स्थिते वा स्वयमेव सूर्ये ।
दीप्तोऽभिधत्ते शकुनो विरौति पुंसः प्रधानस्य हि कारणं तत् ॥१०॥
इसी प्रकार जिस समय नवांश और लग्न में रवि की राशि हो या लग्न में स्वयं
सूर्य अवस्थित हो एवं उस समय शकुन शब्द करे तो प्रधान पुरुष के आगमन का
कारण होता है।।१०।।
पुंराशिवर्ग इति सर्वमनुवर्तते। एवमनेन प्रकारेण रवेरादित्यस्य क्षेत्रनवांशलग्ने।
रविक्षेत्रं सिंह एव। तात्कालिकगते रविक्षेत्रे सिंहेऽथवान्यस्मिन् राशौ लग्नगतं तत्काले
सिंहनवांशके। अथवा स्वयमेव सूर्ये रवौ तात्कालिक