सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 515

वायसविरुताध्यायः ४८७
अन्यदप्याह—
अन्योऽन्यभक्षसंक्रामितानने तुष्टिरुत्तमा भवति।
विज्ञेयः स्त्रीलाभो दम्पत्योर्विरुवतोर्युगपत् ॥४३॥
यदि दो कौवे परस्पर एक-दूसरे के मुख में भोजन देते हों तो गमन करने वाले को
उत्तम तुष्टि का लाभ होता है तथा नर-मादा दोनों साथ-साथ शब्द करें तो स्त्री का लाभ
होता है।।४३।।
अन्योऽन्यं परस्परं भक्षसंक्रामितानने काके भक्षक्षिप्तमुखे यातुरुत्तमा प्रधाना तुष्टिर्भवति।
दम्पत्योर्जायापत्योर्युगपत् तुल्यकालं कृत्वा विरुवतोः क्रोशतोः स्त्रीलाभो योषित्प्राप्तिर्विज्ञेयो
विज्ञातव्यः ।।४३।।
अन्यदप्याह—
प्रमदाशिरउपगतपूर्णकुम्भसंस्थेऽङ्गनाऽर्थसम्प्राप्तिः ।
घटकूट्टने सुतविपद्घटोपहदनेऽन्नसम्प्राप्तिः ॥४४॥
स्त्री के मस्तक-स्थित जलपूर्ण घड़े पर बैठा हुआ कौआ स्त्री का लाभ कराता है।
घड़े को ताड़न करे तो पुत्र का मरण होता है तथा घड़े पर बीट कर दे तो भोजन का
लाभ होता है।।४४।।
प्रमदा स्त्री, तस्याः शिरउपगतो मूर्ध्नि स्थितो यः पूर्णकुम्भस्तत्रस्थे काकेऽङ्गनाऽर्थसम्प्राप्तिः।
स्त्रीलाभोऽर्थप्राप्तिश्च भवति। घटकूट्टने कुम्भताडने सुतविपत् पुत्रमरणं भवति। घटोपहदने
कुम्भपुरीषकरणेऽन्नसम्प्राप्तिर्भोजनलाभो भवति।।४४।।
अन्यदप्याह—
स्कन्धावारादीनां निवेशसमये रुवंश्चलत्पक्षः ।
सूचयतेऽन्यत्स्थानं निश्चलपक्षस्तु भयमात्रम् ॥४५॥
यात्रा में गया हुआ राजा जहाँ पर निवास करता है, उसको 'स्कन्धावार' कहते हैं।
स्कन्धावार आदि के निर्माण-काल में पंखों को चलाता हुआ काक शब्द करे तो दूसरे
स्थान में निवास करने को सूचित करता है तथा पंखों को स्थिर करके शब्द करे तो
केवल भय को सूचित करता है; स्थानान्तर गमन को नहीं।।४५।।
यात्रायां गतो राजा यत्र निवसति स स्कन्धावारः। स्कन्धावारादीनाम्। आदिग्रहणात्
प्रवासिनामन्येषामपि जनानां निवेशसमये निवेशनकाले। निवेशनमावासकादीनां रचनम्।
तस्मिंश्चलत्पक्षः चलिताङ्गरुहः काको रुवन् शब्दं कुर्वन्। अन्यद् द्वितीयं स्थानं सूचयते
कथयति। यथाऽन्यत्र भवद्भिर्वस्तव्यम्। निश्चलपक्षस्तु रुवन् भयमात्रं सूचयते नान्यत् स्थानम्।
तथा च पराशरः—
सेनानिविष्टः सार्थे वा वासो दृष्टो न वाशते।
तस्य देशप्रयातस्य भयमत्रोपजायते।। इति।।४५।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA