बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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में शब्द करे तो धन का अपहरण करने वाला होता है। इससे विपरीत हो ( दक्षिण भाग
में शब्द करके फिर वाम भाग में शब्द करे ) तो अर्थ-सिद्धि करता है।।२६।।
यातुः प्रथममादौ वामभागे वाशित्वा रुतं कृत्वा ततो यदि दक्षिणपार्श्वे वाशते तदा-
ऽर्थस्य धनस्यापहारकारी भवति। तद्विपरीतः पूर्वोक्ताद्विपर्यस्तो दक्षिणपार्श्वे वाशित्वा वामे
वाशते तदाऽर्थसिद्धिं करोति।।२६।।
अन्यदप्याह—
यदि वाम एव विरुवन् मुहुर्मुहुर्यायिनोऽनुलोमगतिः ।
अर्थस्य भवति सिद्ध्यै प्राच्यानां दक्षिणश्चैवम् ।।२७।।
यदि गमन करने वाले के वाम भाग में स्थित कौआ पीछे की ओर गमनशील
होकर बार-बार शब्द करे तो अर्थ की सिद्धि होती है। पूर्व देशवासियों के दक्षिण में
स्थित काक का भी इसी प्रकार का फल होता है अर्थात् यात्राकाल में पूर्व देशवासियों
के दक्षिण में स्थित कौआ पीछे की ओर गमनशील होकर शब्द करे तो अर्थ की सिद्धि
होती है।।२७।।
यदि वाम एव वामभागे यायिनोऽनुलोमगतिर्यातुः पश्चाद्गमनशीलः स मुहुर्मुहुः पुनः-
पुनर्विरुयाद् वाशते तदाऽर्थस्य सिद्ध्यै सिद्धये भवति। एवमनेन प्रकारेण प्राच्यानां दक्षिणः
काकोऽपीष्यते। तेनैतदुक्तं भवति—'दक्षिणे मुहुर्मुहुर्वाशते यायिनोऽनुलोमगतिस्तद्देश्यत'
इति।।२७।।
अन्यदप्याह—
वामः प्रतिलोमगतिर्विरुवन् गमनस्य विघ्नकृद्भवति ।
तत्रस्थस्यैव फलं कथयति तद्वाञ्छितं गमने ।।२८।।
गमन करने वाले के वाम भाग में स्थित कौआ प्रतिलोम गति वाला ( अभिमुख में
आता हुआ ) होकर शब्द करे तो यात्रा में विघ्न करता है; किन्तु यात्रा में जो अभिलषित
फल होता है, वह घर बैठे ही मिल जाता है।।२८।।
वामे यातुर्वामभागस्थः प्रतिलोमगतिर्यायिनोऽभिमुखमागच्छति स च विरुवन् क्रोशन्।
गमनस्य यात्राया विघ्नकृद् भवति। गमने यात्रायां यद्वाञ्छितमभिलषितं फलं तत्रस्थस्यैव
यातुर्निश्चलस्य कथयति वक्ति।।२८।।
अन्यदप्याह—
दक्षिणविरुतं कृत्वा वामे विरुयाद्यथेप्सितावाप्तिः ।
प्रतिवाश्य पुरो यायाद् द्रुतमत्यार्गमो भवति ।।२९।।
यदि कौआ गमन करने वाले के दक्षिण भाग में शब्द करके वाम भाग में शब्द करे
तो अभिलषित अर्थ का लाभ होता है। यदि शब्द करके आगे होकर चला जाय तो
गमन करने वाले को अधिक धन का लाभ होता है।।२९।।
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