बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवायसविरुताध्यायः ४८१
यदि कौआ शान्त वायव्य दिशा को देखता हुआ शब्द करे तो शस्त्र, लोहा, आयुध
( खड्ग आदि ), कमल, लता, फल और भोजन का लाभ होता है। यदि शान्त उत्तर
दिशा की तरफ मुख करके शब्द करे तो पायस भोजन, घोड़ा और वस्त्र का लाभ होता
है।।२३।।
मारुत्यां वायव्यां शान्तामवलोकयन् ब्रूयात्। शस्त्रं लोहम्। आयुधं खड्गादि। सरोजं
पद्मम्। वल्लीफलानि कूष्माण्डादीनि। अशनं भोजनम्। एतेषामाप्तिः प्राप्तिर्भवति। सौम्या-
यामुत्तरस्यां परमान्नाशनं परमात्रं पायसं तदेवाशनम्। तुरङ्गोऽश्वः। अम्बरं वस्त्रम्। एतेषां
च प्राप्तिर्भवति।।२३।।
अन्यदप्याह—
ऐशान्यां सम्प्राप्तिर्घृतपूर्णानां भवेदनडुहश्च।
एवं फलं गृहपतेर्गृहपृष्ठसमाश्रिते भवति ॥२४॥
यदि कौआ शान्त ईशान कोण की तरफ मुख करके शब्द करे तो घी से युक्त भक्ष्य
पदार्थ और बैल का लाभ होता है। इसी प्रकार घर के पीछे स्थित कौए के फल भी
गृहस्वामी को होते है।।२४।।
ऐशान्यां दिशि शान्तायां ब्रूयात् घृतपूर्णानां भक्ष्यविशेषाणामनडुहो वृषभस्य च सम्प्राप्ति-
र्लाभो भवेत् स्यात्। एवमनेन प्रकारेण गृहस्य वेश्मनः पृष्ठे समाश्रिते काके गृहपतेर्गृहस्वामिनः
फलं भवति।।२४।।
गमने कर्णसमश्चेत् क्षेमाय न कार्यसिद्धये भवति।
अभिमुखमुपैति यातुर्विरुवन् विनिवर्तयेद्यात्राम् ॥२५॥
यदि यात्राकाल में कान के बराबर होकर कौवा उड़े तो कुशल करता है; किन्तु
कार्य की सिद्धि नहीं होती है तथा यात्रा करने वाले के सामने में शब्द करता हुआ आ
जाय तो यात्रा में विघ्न करता है।।२५।।
चेच्छब्दो यद्यर्थे। गमने यात्रायां यदि कर्णसमो भवति काकः, कर्णप्रदेशे यातुर्गच्छति,
तदा क्षेमाय भवति। न कार्यसिद्धये क्षेमं करोति न कार्यसिद्धिं करोति। यदर्थं यात्रा तत्कार्य-
सिद्धिं न करोति। यातुरभिमुखं सम्मुखं विरुवन् शब्दं कुर्वन्नुपेत्यागच्छति तदा यात्रां निवर्त-
येद्यात्राविघ्नं करोति। उक्तं च—
यातुः कर्णसमो ध्वांक्षः क्षेमे नार्थप्रसाधकः।। इति।।२५।।
अन्यदप्याह—
वामे वाशित्वादौ दक्षिणपार्श्वेऽनुवाशते यातुः।
अर्थापहारकारी तद्विपरीतोऽर्थसिद्धिकरः ॥२६॥
यदि कौआ पहले यात्रा करने वाले के वाम भाग में शब्द करके फिर दक्षिण भाग
बृ० भ० द्वि०-३१
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