सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 511

वायसविरुताध्यायः ४८३
दक्षिणे यातुर्दक्षिणभागे विरुतं कृत्वा वामे वामभागे विरुयाद्यदि वाशते, तदा यथेप्सि-
तस्य यथाभिलषितस्यार्थस्यावाप्तिर्लाभो भवति। उक्तं च—
वामपार्श्वस्थिताद्याति दक्षिणाद्रापि वामगः। इति।
प्रतिवाश्य शब्दं कृत्वा पुरोऽग्रतो द्रुतं त्वरितं यायाद् याति तदाग्रत एव यातुरत्यर्थस्य
महाधनस्यागमो लाभो भवति।।२९।।
अन्यदप्याह—
प्रतिवाश्य पृष्ठतो दक्षिणेन यायाद् द्रुतं क्षतजकारी।
एकचरणोऽर्कमीक्षन् विरुवंश्च पुरो रुधिरहेतुः ।।३०।।
यदि कौआ पीठ की तरफ शब्द करके दक्षिण पार्श्व से होकर चला जाय तो गमन
करने वाले के शरीर से किसी कारणवश खून निकलता है। यदि एक पाँव से खड़ा
होकर सूर्य को देखता हुआ शब्द करे तो आगे खून निकलने का कारण होता है।।३०।।
पृष्ठतः पश्चात् प्रतिवाश्य दक्षिणेन पार्श्वेन द्रुतं त्वरितं यायाद् गच्छेत् तदा क्षतज-
कारी क्षतजं रक्तं करोति। एकचरण एकपादः, एकेनैव पादेन स्थितोऽर्कमादित्यमीक्षन्
पश्यन् विरुवन् शब्दं कुर्वन् पुरोऽग्रतो रुधिरस्य रक्तस्रावस्य हेतुः कारणम्।।३०।।
अन्यदप्याह—
दृष्ट्वार्कमेकपादस्तुण्डेन लिखेद्यदा स्वपिच्छानि।
पुरतो जनस्य महतो वधमभिधत्ते तदा बलिभुक् ।।३१।।
यदि कौवा एक पाँव से खड़ा होकर सूर्य को देखते-देखते अपनी चोंच से पंखों
को कुरेदे तो भविष्य में किसी प्रधान पुरुष के वध को सूचित करता है।।३१।।
अर्कमादित्यं दृष्ट्वा अवलोक्य एकपाद एकेनैव पादेन स्थितस्तुण्डेन चञ्च्वा स्वपिच्छा-
न्यात्मीयान्यङ्गरुहाणि यदा बलिभुक् काको लिखेत्, तदा पुरतो महतः प्रधानस्य जनस्य
वधं मृत्युमभिधत्ते ददाति।।३१।।
अन्यदप्याह—
सस्योपेते क्षेत्रे विरुवति शान्ते ससस्यभूलब्धिः।
आकुलचेष्टो विरुवन् सीमान्ते क्लेशकृद्यातुः ।।३२।।
यदि धान्यसहित खेत की शान्ता दिशा में स्थित होकर काक शब्द करे तो धान्य-
सहित भूमि का लाभ होता है तथा गाँव की सीमा के अन्त में स्थित होकर व्याकुलतापूर्वक
शब्द करे तो गमन करने वाले को क्लेश करने वाला होता है।।३२।।
सस्योपेते सस्यसंयुक्ते क्षेत्रे शान्ते काके विरुवति ससस्यायाः सस्यसंयुक्ताया भुवो
भूमेर्लब्धिर्लाभो भवति। सीमान्ते ग्रामसीमान्ते स्थितस्तत्र चाकुलचेष्टः सोद्यमो विरुवन्
यातुः क्लेशकृद्भवति।।३२।।