बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवास्तुविद्याध्यायः २१
याम्याहीनं चुल्ली त्रिशालकं वित्तनाशकरमेतत् ।
पक्षघ्नमपरया वर्जितं सुतध्वंसवैरकरम् ॥३८॥
जिसके उत्तर तरफ भीत (दीवाल) न हो और शेष तीन दिशाओं में हो, उसको
‘हिरण्यनाभ’ नामक त्रिशाल वास्तु कहते हैं, यह वास्तु प्रशस्त है। जिसके पूर्व तरफ
भीत न हो और शेष तीन दिशाओं में हो, उसको ‘सुक्षेत्र’ नामक त्रिशाल वास्तु कहते हैं,
यह वास्तु धन, पुत्र आदि की वृद्धि करती है। जिसके दक्षिण तरफ भीत न हो और शेष
तीन दिशाओं में हो उसको ‘चुल्ली’ नामक त्रिशाल वास्तु कहते हैं, यह वास्तु धन का
नाश करती है। जिसके पश्चिम तरफ भीत न हो और शेष तीन दिशाओं में हो उसको
‘पक्षघ्न’ नामक त्रिशाल वास्तु कहते हैं, यह वास्तु पुत्र का नाश और वैर कराने वाली
होती है॥३७-३८॥
उत्तरशालया यद्विहीनम्। अन्यासु तिसृषु दिक्षु शाला भवन्ति। केवलयोत्तरया रहितं
तत्रिशालकं हिरण्यनाभाख्यम्, तच्च धन्यं प्रशस्तम्। एवं प्राक्शालया पूर्वशालया वियुक्तं
रहितं तत्रिशालं सुक्षेत्रं नाम वास्तु, तच्च वृद्धिं धनसुतादीनां ददाति।
याम्याहीनं दक्षिणस्यां दिशि रहितं तच्चुल्लीसंज्ञं त्रिशालम्। एतच्च वित्तस्य
धनस्य नाशकरं क्षयावहम्। अपरया पश्चिमशालया यद्विवर्जितं तत्पक्षघ्नं पक्षघ्नसंज्ञम्,
तच्च सुतध्वंसवैरकरम्—सुतानां पुत्राणां ध्वंसं विनाशं वैरं च करोति। एषां विन्यासः
सुगमत्वान्न प्रदर्शितः। यतश्चतुःशालाकृतिरेवालिन्दवर्जिता एकादिगृहीतेति। तथा च
किरणाख्ये तन्त्रे—
शस्तं हिरण्यनाभाख्यं हीनं चोत्तरशालया।
सुक्षेत्रं पूर्वतो हीनं शालया वृद्धिदं मतम्॥
चुल्ली दक्षिणया हीनं धनार्थप्राणनाशनम्।
यत् स्यादपरया हीनं पक्षघ्नं तत् सुतान्तकृत्॥ इति॥३७-३८॥
अथ द्विशालानां सिद्धार्थयमसूर्यदण्डवाताख्यचुल्लीकाचानां लक्षणं सफलमाह—
सिद्धार्थमपरयाम्ये यमसूर्यं पश्चिमोत्तरे शाले।
दण्डाख्यमुदक्पूर्वे वाताख्यं प्राग्युता याम्या ॥३९॥
पूर्वापरे तु शाले गृहचुल्ली दक्षिणोत्तरे काचम्।
सिद्धार्थेऽर्थावाप्तिर्यमसूर्ये गृहपतेर्मृत्युः ॥४०॥
दण्डवधो दण्डाख्ये कलहोद्वेगः सदैव वाताख्ये।
वित्तविनाशश्चुल्यां ज्ञातिविरोधः स्मृतः काचे ॥४१॥
जिसके पश्चिम और दक्षिण में शाला हो उसको ‘सिद्धार्थ’, जिसके पश्चिम और
उत्तर में शाला हो उसको ‘यमसूर्य’, जिसके उत्तर और पूर्व में शाला हो उसको ‘दण्ड’,
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