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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 760 में से

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पृष्ठ 48

२० बृहत्संहिता
'रुचक' वास्तु में पूर्व और पश्चिम का अलिन्द अन्तगत ( दक्षिणोत्तर शाला से
संलग्न ) और शेष दो उन दोनों के मध्य में स्थित होता है। इस रुचक वास्तु में उत्तर
दिशा का द्वार अशुभ और अन्य ( पूर्व, पश्चिम और दक्षिण ) द्वार शुभ होता है।।३५।।
रुचके प्राक्पश्चिमौ पूर्वापरौ द्वावलिन्दावन्तगतौ शेषौ, तयोरवधौ मध्ये स्थितौ तत्सं-
लग्नावित्यर्थः। एवं रुचके द्वारमुत्तरं न शुभदम्। अन्यानि त्रीणि पूर्वदक्षिणपश्चिमानि शस्ता-
नीति। तथा च गर्गः—
प्राक्पश्चिमावलिन्दौ यावन्तगौ तद्द्वौ परौ।
सौम्यं द्वारं विना यत्स्याद् रुचकाख्यं तु तत्स्मृतम्।। इति।।३५।।
रुचकम्
पूर्वा
[रेखाचित्र: शाला]
अथ तेषां पञ्चानां चतुःशालानां फलान्याह—
श्रेष्ठं नन्द्यावर्तं सर्वेषां वर्धमानसंज्ञं च।
स्वस्तिकरुचके मध्ये शेषं शुभदं नृपादीनाम् ।।३६।।
नन्द्यावर्त्त और वर्धमानसंज्ञक वास्तु सबके लिये श्रेष्ठ होते हैं। स्वस्तिक और
रुचकसंज्ञक वास्तु मध्यम होते हैं। शेष सर्वतोभद्रसंज्ञक वास्तु राजा आदि ( राजमन्त्री,
राजाश्रित पुरुष और देवता ) के लिये शुभ होते हैं; अन्य के लिये नहीं।।३६।।
सर्वेषां वर्णानां नन्द्यावर्तं चतुःशालं श्रेष्ठं प्रशस्तम्। वर्धमानसंज्ञं वर्धमानाख्यं च।
चशब्दाच्छ्रेष्ठमेव। स्वस्तिकरुचके सर्वेषामेव मध्ये मध्यफले, न शुभे नाप्यशुभे इत्यर्थः।
शेषं सर्वतोभद्रसंज्ञं चतुःशालं नृपादीनां राज्ञां राजमन्त्रिणां राजाश्रितानां देवानां च शुभम्,
नान्येषामिति।।३६।।
अथ त्रिशालानां हिरण्यनाभसुक्षेत्रचुल्लीपक्षघ्नानां लक्षणमाह—
उत्तरशालाहीनं हिरण्यनाभं त्रिशालकं धन्यम्।
प्राक्शालया वियुक्तं सुक्षेत्रं वृद्धिदं वास्तु ।।३७।।
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