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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 760 में से

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पृष्ठ 47

वास्तुविद्याध्यायः १९
अथ स्वस्तिकलक्षणमाह—
अपरोऽन्तगतोऽलिन्दः प्रागन्तगतौ तदुत्थितौ चान्यौ ।
तदवधिविधृतश्चान्यः प्राग्द्वारं स्वस्तिके शुभदम् ॥३४॥
‘स्वस्तिक’ वास्तु में पश्चिम का अलिन्द अन्तगत ( दक्षिणोत्तर शाला से संलग्न )
बनाना चाहिये। पश्चिम अलिन्द से निकले हुये अन्य दो अलिन्दों को पूर्व दिशा की
शाला से संलग्न करते हुये बनाना चाहिये। उन दोनों के मध्य में पूर्व का अलिन्द
बनाना चाहिये। इस स्वस्तिक वास्तु में केवल पूर्व दिशा में द्वार बनाना शुभ होता है;
अन्य दिशा में नहीं॥३४॥
स्वस्तिकेऽपरः पश्चिमोऽलिन्दोऽन्तगतः कार्यो दक्षिणोत्तरशालासंलग्नः। अन्यौ तु
दक्षिणोत्तरौ द्वावलिन्दौ तदुत्थितौ तस्मात् पश्चिमादलिन्दादुत्पन्नौ प्राक्पूर्वस्यां दिश्यन्तगतौ
शालासंलग्नौ कार्यौ। अन्यश्चतुर्थः पूर्वोऽलिन्दस्तदवधिविधृतस्तयोरवधौ मध्ये विधृतः
स्थित इत्यर्थः। एवं स्वस्तिकं प्राग्द्वारं शुभदं पूर्वस्यां दिशि द्वारं तस्मिन् कार्यम्, नान्यत्र
क्वचिदिति। तथा च गर्गः—
पश्चिमोऽन्तगतोऽलिन्दः प्रागन्तो द्वौ तदुत्थितौ।
अन्यस्तन्मध्यविधृतः प्राग्द्वारं स्वस्तिकं शुभम्॥ इति॥३४॥
स्वस्तिकम्
पूर्वा
शाला
अथ रुचकलक्षणमाह—
प्राक्पश्चिमावलिन्दावन्तगतौ तदवधिस्थितौ शेषौ।
रुचके द्वारं न शुभदमुत्तरतोऽन्यानि शस्तानि ॥३५॥
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