सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 470

प्राप्ति तथा वस्त्र, वल्कल आदि लेकर आ जाय तो मृत्यु होती है। कोई-कोई वस्त्रसहित
कुत्ते को आगे आने में शुभ फल कहते हैं। यदि सूखी हुई हड्डी लेकर कुत्ता घर में प्रवेश
करे तो गृहपति की मृत्यु होती है। यदि जञ्जीर, पुरानी लता, चमड़े की रस्सी आदि
लेकर आगे आ जाय तो गमन करने वाले को बन्धन होता है। यदि गमन करने वाले के
पाँव चाटे या अपने कान को पटपटाते हुये गमन करने वाले के ऊपर चढ़ने की इच्छा
करे तो यात्रा में विघ्न होता है। यदि गमन करने वाले के मार्ग का विरोध करे या अपने
अङ्ग को खुजलावे तो मार्ग में विरोध होता है। यदि गमन करने वाले या एक जगह पर
स्थित मनुष्य के आगे में ऊपर पाँव करके सो जाय तो सदा दोषकारी होता है॥१॥
गमनमुखमिति। यदोपानहं मुखेन सम्प्रगृह्योपतिष्ठेद् गमनमुखं यियासुमुपतिष्ठेत्
समीपे तस्य तिष्ठेत् तदा सिद्धयेऽर्थानां स्याद्भवेत्। मांसपूर्णानने आमिषपूरितवदने अर्थाप्ति-
र्धनानां लाभो भवति। आर्द्वेण सरसेनास्थ्ना पूर्णानने शुभम्। अग्निना अलातेन दग्धकाष्ठेन
शुष्केण नीरसेन चास्थ्ना गृहीतेन मृत्युर्मरणं यातुर्भवेत्। प्रशान्तेनाग्नि-रहितेनोल्मुकेनाभिघात
उपद्रवः। अथशब्दो विकल्पे। पुंसो मनुष्यस्य। शिरो मूर्धा। हस्तौ पाणी। पादौ चरणौ।
आदिग्रहणादन्यमप्यवयवं वस्त्रे गृहीत्वा उपतिष्ठेत्, तदा भुवो भूम्या अभ्यागमो लाभो
भवति। वस्त्रमम्बरम्। चीराणि वृक्षवल्कलानि। आदिग्रहणाद्वस्त्रचीरैकदेशमपि। एतैर्व्यापदो
भवन्ति। केचिन्मुनयः सवस्त्रे सारमेये शुभमाहुः कथयन्ति। तथा च पराशरः—'गमने
यातुर्वस्त्रगृहीतवक्त्रे सारमेये महानर्थलाभः' इति।
विशति त्विति। सशुष्कास्थि वक्त्रे मुखे यस्य तथाभूते सारमेये गृहं वेश्म
प्रविशति तु तस्मिन् गृहे प्रधानस्य पुरुषस्य गृहपतेर्वधो मरणं भवति। शृङ्खला प्रसिद्धा
लोहमयी। शीर्णा पुरातना। वल्ली प्रसिद्धा। वरत्रा चर्ममयी रज्जुः। आदिग्रहणाद्यद्रज्ज्वादिकं
बन्धननिगडादिकं चोपगृह्य यदोपतिष्ठेत् तदा बन्धनं स्याद् भवेत्। यातुः पादौ चरणौ
लेढि। स्वकर्णौ स्वश्रोत्रे विधुन्वंश्चालयन्नुपरि यातुर्वा आक्रमन् प्लावितुमिच्छन् यातुर्यात्राविघ्नाय
भवेत्। यातुः सविरोधे यातुरेव पथि विरोधः। विरोधोऽत्र मार्गरोधो ज्ञेयः। तथा च गर्गः—
प्रस्थितस्य यदा श्वा वै मार्गं बद्ध्वा तु तिष्ठति।
अवरुद्धं तदाध्वानं चौरैरिति विनिर्दिशेत्॥
तथा स्वाङ्गस्यात्मीयावयवस्य कण्डूयने यातुर्विरोधः स्यात्। ऊर्ध्वपाद ऊर्ध्वचरणः
स्वपन् सदा सर्वस्मिन् काले गमने यातुरेकदेशस्थस्य वा दोषकृद्भवेत्॥१॥
अथ दिग्भागेन शुनः फलमाह—
सूर्योदयेऽर्काभिमुखो विरौति ग्रामस्य मध्ये यदि सारमेयः।
एको यदा वा बहवः समेताः शंसन्ति देशाधिपमन्यमाशु॥२॥
यदि सूर्योदय के समय एक या बहुत से कुत्ते इकट्ठे होकर सूर्य की तरफ मुख
करके रुदन करें तो शीघ्र ही देश में अन्य स्वामी होने को सूचित करते हैं॥२॥