बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्वचक्राध्यायः ४४१
अशुभ फल सूचित करता है। शय्या या विना फूटे नवीन कुम्हार के भाण्ड पर मूत्रत्याग
करने से कन्या में दोष और बरतने वाले भाण्ड पर मूत्रत्याग करने से गमन करने वाले
की गृहिणी में दोष उत्पन्न करता है। इसी प्रकार जूते पर मूत्रत्याग करने का भी फल
होता है। जैसे नवीन जूते पर मूत्रत्याग करने से कन्या में दोष और बर्ते हुये जूते पर
मूत्रत्याग करने से गृहिणी में दोष उत्पन्न करता है। यदि गो जाति के ऊपर मूत्रत्याग कर
कुत्ता गमन करने वाले के आगे आ जाय तो उसके घर में निकृष्ट वर्णसङ्कर की उत्पत्ति
होती है।
विषतरौ विषवृक्षे। कण्टक्यां सकण्टके वृक्षे। काष्ठे पाषाणेऽश्मनि। शुष्कद्रुमे
शुष्कवृक्षे। अस्थिश्मशाने वा। एषामन्यतमस्थानमवमूत्र्य अथवा हस्तेन पादेन वाऽवहृत्य
सन्ताड्य यायिनो गच्छतोऽग्रेसरः पुरतो याति, तदाऽनिष्टमशुभमाख्याति कथयति। शय्या
आस्तरणम्। कुलालादिभाण्डानि कुम्भकारकृतानि मृन्मयानि। आदिग्रहणाद् दारुमयान्यपि।
अभुक्तानि अभिनवानि। अभिन्नान्यस्फुटानि वा। अत्र मूत्रयन् कन्यकादोषकृत् कुमार्या
दौःशील्यं करोति। यदि भुज्यमानानि भाण्डानि अवमूत्रयति तदा तद्गृहिण्या दुष्टतां करोति।
उपानत्फलं तथा तेनैव प्रकारेण स्यात्। एतदुक्तं भवति—अभुक्ते उपानहाववमूत्रयन् कन्यका-
दोषकृत्, भुज्यमाने चेत् तद्गृहिण्या दुष्टतां करोति। गोस्तु सम्मूत्रणे अवर्णजो निकृष्टवर्णजातः
सङ्करोऽत्र गृहे। उक्तं च—
विषकण्टकशुष्कवृक्षलोष्ठानवमूत्र्यास्थिचितेन याति चेच्छ्वा।
न शुभोऽभिमुखं भषन्विधुन्वन् पुच्छाङ्गं विलिखन्नखे वसाञ्च।।
अन्यदप्याह—
गमनमुखमुपानहं सम्प्रगृह्योपतिष्ठेद्यदा स्यात्तदा सिद्धये मांसपूर्णानने-
ऽर्थाप्तिरार्द्रेण चास्थ्ना शुभं साग्न्यलातेन शुष्केण चास्थ्ना गृहीतेन
मृत्युः प्रशान्तोल्मुकेनाभिघातोऽथ पुंसः शिरोहस्तपादादिकवक्त्रे भुवोऽभ्या-
गमो वस्त्रचीरादिभिर्व्यापदः केचिदाहुः सवस्त्रे शुभम्।
प्रविशति तु गृहं सश्रुष्कास्थिवक्त्रे प्रधानस्य तस्मिन् वधः शृङ्खलाशीर्ण-
वल्लीवरत्रादि वा बन्धनं चोपगृह्योपतिष्ठेद्यदा स्यात् तदा बन्धनं लेढि
पादौ विधुन्वन् स्वकर्णावुपर्याक्रमंश्चापि विघ्नाय यातुर्विरोधे विरोधस्तथा
स्वाङ्गकण्डूयने स्यात् स्वपंश्चोध्र्वपादः सदा दोषकृत् ॥१९॥
यदि कुत्ता मुख से जूते को ग्रहण करके गमन करने वाले के समीप आ जाय तो
कार्य की सिद्धि, मांस लेकर आ जाय तो धन की प्राप्ति, आर्द्र हड्डी लेकर आ जाय तो
शुभ-प्राप्ति, जला हुआ काष्ठ या सूखा मांस लेकर आ जाय तो गमन करने वाले की
मृत्यु और अग्निरहित उल्मुक (जला हुआ काष्ठ) लेकर आ जाय तो उपद्रव होता है।
यदि मनुष्य के शिर, हाथ, पाँव आदि कोई अवयव मुख में लेकर आ जाय तो भूमि की
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