बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्वचक्राध्यायः ४४३
सारमेयः श्वा ग्रामस्य मध्ये सूर्योदये अकोद्गमनकाले यद्यर्काभिमुख आदित्याभिमुखो
विरौति शब्दं करोति। एकोऽथवा बहवो यदा प्रभूताः समेताः सहितास्तदाऽऽशु शीघ्रं देशा-
धिपं देशस्वामिनमन्यं द्वितीयं शंसन्ति॥२॥
अन्यदप्याह—
सूर्योन्मुखः श्वानलदिक्स्थितश्च चौरानलत्रासकरोऽचिरेण।
मध्याह्नकालेऽनलमृत्युशंसी सशोणितः स्यात् कलहोऽपराह्ने ॥३॥
यदि अग्निकोण में स्थित कुत्ता सूर्य की तरफ मुख करके रुदन करे तो शीघ्र ही
चोर और अग्नि का भय, मध्याह्न काल में सूर्य की ओर मुख करके रुदन करे तो अग्नि
का भय और मृत्यु तथा अपराह्न में सूर्याभिमुख होकर रुदन करे तो रुधिरस्राव के साथ
लड़ाई को सूचित करता है।।३।।
श्वा सारमेयः। सूर्योन्मुख आदित्याभिमुखः। अनलदिक्स्थितश्च आग्नेय्यभिमुखो विरौति,
तदा अचिरेण शीघ्रकालेन चौरानलत्रासकरः, चौरैस्तस्करैरनलेनाग्निना त्रासं भयं करोति।
मध्याह्नकाले सूर्याभिमुखो भवन्। अनलमृत्युशंसी अनलमग्निं मृत्युं मरणं च शंसति कथयति।
अपराह्ने तृतीये प्रहरे सूर्याभिमुखो भवन् सशोणितो रक्तसहितः कलहः स्याद् भवेत्।।३।।
अन्यदप्याह—
रुवन् दिनेशाभिमुखोऽस्तकाले कृषीवलानां भयमाशु दत्ते।
प्रदोषकालेऽनिलदिङ्मुखश्च दत्ते भयं मारुततस्करोत्थम् ॥४॥
सूर्यास्त काल में सूर्य की तरफ मुख करके कुत्ता रुदन करे तो किसानों को शीघ्र
भय तथा प्रदोषकाल में वायव्य कोण में स्थित होकर रुदन करे तो वायु और चोरों से
भय देता है।।४।।
अस्तकाले अस्तमये, दिनेशाभिमुखोऽर्कसम्मुखः। रुवन् क्रोशन्। कृषीबलानां कार्षि-
काणाम्। आशु शीघ्रम्। भयं भीतिम्। दत्ते ददाति। प्रदोषकाले रात्रिमुखेऽनिलदिङ्मुखो
वायव्याशाभिमुखो रुवन् मारुततस्करोत्थं मारुताद् वायोस्तस्करेभ्यः समुत्थमुत्पन्नं भयं
दत्ते ददाति।।४।।
अन्यदप्याह—
उदङ्मुखश्चापि निशार्धकाले विप्रव्यथां गोहरणं च शास्ति।
निशावसाने शिवदिङ्मुखश्च कन्याभिदूषानलगर्भपातान् ॥५॥
यदि आधी रात में उत्तर की तरफ मुँह करके कुत्ता रुदन करे तो ब्राह्मणों को पीड़ा
और गायों की चोरी होने को सूचित करता है। यदि रात्रि के अन्त में ईशान कोण की
तरफ मुख करके कुत्ता रुदन करे तो कुमारी को दूषित, अग्नि का भय और स्त्रियों का
गर्भपात कराता है।।५।।
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