बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ श्वचक्राध्यायः
अथ श्वचक्रं व्याख्यायते। तत्रादावेव चेष्टितमाह—
नृतुरगकरिकुम्भपर्याणसक्षीरवृक्षेष्टकासञ्चयच्छत्रशय्यासनोलूखलानि
ध्वजं चामरं शाद्वलं पुष्पितं वा प्रदेशं यदा श्वावमूत्र्यायतो याति यातुस्तदा
कार्यसिद्धिर्भवेद्रार्द्रके गोमये मिष्टभोज्यागमः शुष्कसम्मूत्रणे शुष्कमन्नं
गुडो मोदकावाप्तिरेवाथवा ॥
जिस समय मनुष्य, घोड़ा, हाथी, घड़ा, पर्याण, क्षीर ( आक आदि ), ईंट का ढेर,
छत्र, शय्या, आसन, ऊखल, ध्वज, चामर, दूब और फूल वाले स्थान पर मूत्रत्याग
कर कुत्ता गमन करने वालों के आगे होकर जाय, उस समय कार्य की सिद्धि, गीले
गोबर पर मूत्रत्याग कर आगे होकर जाय तो मिष्टान्न भोजन की प्राप्ति तथा सूखी वस्तु
पर मूत्रत्याग कर गमन करने वाले के आगे होकर जाय तो सूखे अन्न, गुड़ और मोदकों
की प्राप्ति होती है।