बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविरुताध्यायः ४३७
एको निशीथेऽनलदिक्स्थितश्च दिव्यैतरैस्तां शपथैर्नियोज्य ।
पृच्छेद्यथाचिन्तितमर्थमेवमनेन मन्त्रेण यथाशृणोति ॥४१॥
दिनान्तकालिक सन्ध्या समय में पवित्र होकर नवीन वस्त्र धारण करके उस
पिंगला के निवास वृक्ष के समीप जाकर सुगन्धित द्रव्यों ( चन्दन, कुङ्कुम, कस्तूरी,
अगरु आदि द्रव्यों ) से उस वृक्ष का तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश—इन तीनों देवताओं का
पूजन करके मध्य रात्रि के समय एकाकी अग्निकोण में स्थित होकर दिव्य और लौकिक
शपथों में सम्बोधन करते हुये जिस प्रकार से वह सुने, उस प्रकार से वक्ष्यमाण मन्त्रों
के द्वारा पूर्व चिन्तित अर्थ की सिद्धि को पूछना चाहिये॥४०-४१॥
दिनान्तसन्ध्यासमय इति । तस्याः पिङ्गलाया दिनान्ते अस्तसमये यः सन्ध्यासमयः
सन्ध्याकालस्तस्मिन् दिनान्तसन्ध्यासमये निवासं गृहमागम्य गत्वा वृक्षं तरुं प्रयतोऽनुच्छिष्टः
संयतः पितामहादीन् ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् देवान् सुरान् समभ्यर्च्य सम्पूज्य। कीदृशः प्रष्टा?
नवाम्बरोऽभिनववसनः सन्, तं तरुं वृक्षं सुगन्धैः सुगन्धद्रव्यैश्चन्दनकुङ्कुमकस्तूरिकागुरु-
प्रभृतिभिरभ्यर्च्य।
ततो निशीथे सुप्तजनेऽर्धरात्रावधौ एक एवानलदिक्स्थ आग्नेयाशासमवस्थितः तां
च पिङ्गलां शपथैः प्रत्ययैर्दिव्यैतरैर्देवानां सम्बन्धिभिः शपथैरितरैरन्यैर्लौकिकैश्च नियोज्य
सन्निवेश्य ततो यथा येन प्रकारेणाशृणोत्याकर्णयति तथाऽनेन वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण यथा-
चिन्तितमेवार्थं तस्याः सिद्धिं पृच्छेत्॥४०-४१॥
अथ मन्त्रमाह—
विद्धि भद्रे मया यत् त्वमिममर्थं प्रचोदिता ।
कल्याणि सर्ववचसां वेदित्री त्वं प्रकीर्त्यसे ॥४२॥
आपृच्छेऽद्य गमिष्यामि वेदितश्च पुनस्त्वहम्।
प्रातरागम्य पृच्छे त्वामाग्नेयीं दिशमाश्रितः ॥४३॥
प्रचोदयाम्यहं यत्त्वां तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ।
स्वचेष्टितेन कल्याणि यथा वेद्मि निराकुलम् ॥४४॥
हे भद्रे ! मैं जो इस अर्थ को पूछने के लिये आरम्भ कर रहा हूँ, उसको तुम जानती
हो। हे कल्याणि ! तुम सब वाक्यों को जानने वाली कही जाती हो। आज पूछ कर मैं
जाऊँगा, फिर प्रातःकाल में जानने वाला मैं आकर अग्निकोण में स्थित होकर पूछूँगा।
तुम भी जो मैं पूछता हूँ, उसको हे कल्याणि ! अपनी चेष्टा के द्वारा जिस प्रकार निस्संशय
होकर मैं जान सकूँ, उस प्रकार कहने के लिये समर्थ हो॥४२-४४॥
विद्धि भद्रे इति । हे भद्रे कल्याणवति मया यत् त्वमिममर्थं प्रचोदिता प्रष्टुमारब्धा विद्धि
जानीहि। हे कल्याणि सौभागिनि सर्ववचसां निःशेषवाक्यानां त्वं वेदित्री ज्ञप्त्री प्रकीर्त्यसे ।
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