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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 760 में से

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पृष्ठ 463

विरुताध्यायः ४३५
रात्रि में भयभीत हुये मुर्गों के 'कुकुकुकु' शब्दों को छोड़कर शेष सभी प्रकार के
शब्द भय देने वाले होते हैं तथा रात्रि के अन्त में स्वस्थ होकर तार स्वर से शब्द करे
तो राज्य, पुर और राजा को बुद्धि करने वाले होते हैं॥३४॥
ताम्रचूड़ाः कुक्कुटा रात्रौ निशि सभयाः 'कुकुकुकु' इति रुवन्ति शब्दं कुर्वन्ति।
तानि तु रुतानि त्यक्त्वा परित्यज्यापराण्यन्यानि भयदानि भवन्ति। स्वस्थैः स्वभाव-
स्थैर्नीरुजैर्परतन्त्रैः स्वभावविरुतानि प्राकृतानि। स्वाभाविकाः शब्दा निशावसाने रात्र्यन्ते तारा-
ण्युच्चतराणि यानि क्रियन्ते तानि राष्ट्रस्य जनपदस्य पुरस्य नगरस्य पार्थिवस्य राज्ञो वृद्धि-
दानि वृद्धिं ददति॥३४॥
अथ छिप्पिकाबिडालविरुतं गोक्षुतं चाह—
नानाविधानि विरुतानि हि छिप्पिकाया-
स्तस्याः शुभाः कुलुकुलुर्न शुभास्तु शेषाः ।
यातुर्बिडालविरुतं न शुभं सदैव
गोस्तु क्षुतं मरणमेव करोति यातुः ॥३५॥
छिप्पिका के अनेक प्रकार के शब्द होते हैं, उनमें 'कुलुकुलु' शब्द शुभ नहीं होते,
शेष सभी शब्द शुभ होते हैं। मार्जार का शब्द गमन करने वाले के लिये अशुभ होता है
तथा गो जाति की छींक यात्रा करने वाले की मृत्यु को सूचित करती है॥३५॥
छिप्पिकाया नानाविधानि बहुप्रकाराणि विरुतानि भवन्ति। तेभ्यो मध्यात् तस्यास्तु
कुलुकुलुशब्दाः शुभाः। शेषा अपरास्तु सर्व एव न शुभाः। बिडालविरुतं मार्जारशब्दो
यातुः सदैव सर्वकालमेव न शुभम्। गोस्तु पुनः क्षुतं यातुर्मरणमेव करोति। उक्तं च—
सर्वत्र पापं क्षुतमुदिशन्ति गोस्तु क्षुतं मृत्युकरं यियासोः।
मार्जारिरावस्खलनं च यातुर्वस्त्रस्य सङ्गस्य न शोभनानि॥ इति॥३४॥
अथोलूकविरुतमाह—
हुंहुंगुग्लुगिति प्रियामभिलषन् क्रोशत्युलूको मुदा
पूर्णः स्याद् गुरुलु प्रदीप्तमपि च ज्ञेयं सदा किस्किसि ।
विज्ञेयः कलहो यदा बलबलं तस्यासकृद्द्वाशितं
दोषायैव तट्टटेति न शुभाः शेषास्तु दीप्तस्वराः ॥३६॥
अपनी प्रिया की अभिलाषा करता हुआ उल्लू आनन्द से 'हुँहुँगुगुलुक' शब्द करता
है। इसका 'गुरुलु' शब्द पूर्ण है। 'किस्किसि' शब्द सदा प्रदीप्त है। जब उल्लू का
बार-बार 'बलबल' शब्द हो तो कलह, 'टट्टट' शब्द दोष करने वाला और शेष सभी
शब्द दीप्त होते हैं॥३६॥
उलूको मुदा हर्षेण प्रियां स्वपत्नीमभिलषन् वाञ्छन् हुंहुंगुग्लुगिति क्रोशति वाशति।
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