बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१८ बृहत्संहिता
यदि पश्चिम दिशा के अर में स्थित शकुन हो तो किसानों के साथ समागम तथा
समुद्र में उत्पन्न द्रव्य, काच ( मणिविशेष ), फल और मद्य का लाभ होता है।।२३।।
अपरस्यां पश्चिमायामरस्तत्र तस्मिन् कृषीवलैः कार्षिकैरासक्तिः संयोगो भवति। सामुद्र-
द्रव्याणां सुसारस्य काचस्य च लब्धिर्लाभो भवति। सुसारो मणिविशेषः। फलानामास्रादीनां
मद्यस्य पानविशेषस्य च लब्धिर्लाभो भवति।।२३।।
अन्यदप्याह—
भारवहतक्षभिक्षुकसन्दर्शनमपि च वायुदिक्संस्थे।
तिलककुसुमस्य लब्धिः सनागपुंनागकुसुमस्य ॥२४॥
यदि वायव्य कोण के अर में स्थित शकुन हो तो भार ढोने वाले, बढ़ई और भिक्षुक
का दर्शन तथा तिलक, नाग, पुन्नाग—इसके फूलों का लाभ होता है।।२४।।
वायव्यां दिशि योऽरस्तत्संस्थे शकुने भारवहो भारवाहकः। तक्षो वर्धकिः। भिक्षुको
यतिः। एषां सन्दर्शनं भवति। तिलककुसुमस्य, तिलको वृक्षविशेषः, तत्पुष्पाणां लब्धि-
र्भवति। पुन्नागकुसुमस्य पुन्नागपुष्पस्य सनागस्य नागकुसुमेन सहितस्य लब्धिर्भवति।।२४।।
अन्यदप्याह—
कौबेर्यां दिशि योऽरस्तत्रस्थो वित्तलाभमाख्याति।
भागवतेन समागमनमाचष्टे पीतवस्त्रैश्च ॥२५॥
उत्तर दिशा के अर में स्थित शकुन हो तो धन का लाभ तथा वैष्णव, ब्राह्मण और
पीले वस्त्र के साथ समागम होता है।।२५।।
कौबेर्यामुत्तरस्यां दिशि शान्तायां योऽरस्तत्रस्थः शकुनो वित्तलाभं धनलब्धिमाख्याति
कथयति। तथा भागवतेन वैष्णवेन द्विजेन सह समागमं संयोगमाचष्टे कथयति। पीत-
वस्त्रैश्च पीतवर्णैरम्बरैः संयोगम्।।२५।।
अन्यदप्याह—
ऐशाने व्रतयुक्ता वनिता सन्दर्शनं समुपयाति।
लब्धिश्च परिज्ञेया कृष्णायःशस्त्रघण्टानाम् ॥२६॥
यदि ईशान कोण के अर में स्थित शकुन हो तो व्रत करने वाली स्त्री का दर्शन तथा
काला लोहा, शस्त्र और घण्टों का लाभ होता है।।२६।।
ऐशानेऽरे व्रतयुक्ता व्रतस्था वनिता स्त्री सन्दर्शनं समुपयाति गच्छति। कृष्णायसः
कृष्णलोहस्य शस्त्रस्य घण्टानां च लब्धिः परिज्ञेया।।२६।।
अथात्रैव विशेषमाह—
याम्येऽष्टांशे पश्चाद् द्विष्ट्रिसप्ताष्टमेषु मध्यफला।
सौम्येन च द्वितीये शेषेष्वतिशोभना यात्रा ॥२७॥
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